बुधवार, 1 अप्रैल 2009

हमारी सांस्कृतिक इच्छा

घीसू और माधो कफ़न के लिए इकट्ठे किए गए पैसों का कफ़न नहीं खरीदते हैं- बल्कि पूरी खाते हैं , दारू पीते हैं। हमारे ख्याल से उन्हें 'भूखे-बिलबिलाते' रहकर कफ़न खरीदना चाहिए था। किंतु उन दोनों भूखों ने ऐसा नहीं किया। क्यों नहीं किया ?
इसका सबसे सुविधाजनक जबाव है कि वे 'चरित्र-भ्रष्ट' हैं। उसे चरित्र-भ्रष्ट मानकर हम सुख पाते हैं। हमें अपनी मर्जी, अपनी संस्कृति(?), अपनी परम्पराएं, अपनी समझ, अपनी ज़रूरत - सबसे अधिक उचित और प्रिय लगती हैं।
'गोदान ' में होरी तिल-तिल कर मरता है - हमने उसकी मौत को सार्थक माना। हमने सहानुभूति जताई कि मरजाद के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर गया।
घीसू-माधो को भूखे रहकर 'नए वस्त्र रूपी कफ़न में लपेट कर ' अपनी पत्नी/बहु का अन्तिम संस्कार करना चाहिए। पेट में भूख से आग लगी है , किसी तरह से उसके पास पैसे आ गए उसने खा लिया।
सनद रहे, भूख इच्छा नहीं , अनिवार्य ज़रूरत है जबकि कफ़न मात्र एक सांस्कृतिक इच्छा

1 टिप्पणी:

अल्पना वर्मा ने कहा…

गहन भाव..आप की सोच दार्शनिक है.