शनिवार, 14 मार्च 2015

यह कविता समय नामक मेरा ब्लॉग लगभग डेढ़ साल से सुप्त पड़ा है. इसे अब मैं फिर से इस निर्णय के साथ जगा रहा हूँ कि अब से इस लिंक पर अन्य रचनाकार/प्रति रचनाकार के लेखन को प्रकाशित करुंगा।
आप अपनी कविताएँ या / और कविता संबंधी विचार / प्रतिक्रियाएं इस ब्लॉग पर प्रकाशनार्थ प्रेषित कर सकेंगे.
पता है
dr.ravindradas@gmail.com
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रविवार, 11 मार्च 2012

अस्मिताएँ .

धीरे धीरे
तुम्हारा सच
छुप जाएगा
कौंधती रौशनी में
इसलिए
पहले भी कहा था
लगा दो
काला डिठौना
अपने सच को
कई सम्मोहक
लगा रहे हैं
फेरियाँ
उन्हें
जब जब
लगती है
भूख
तब तब
निगलते है
अस्मिताएँ ...

मंगलवार, 6 मार्च 2012

झूठ क्या होता है?

बड़ा ही पुराना प्रसंग है - सच और झूठ का ।
क्या होता है सच ? हमें पता है ? फिर भी हम दावा करते है कि जी, हम सच जानते हैं। और हमारे इसी दावे से दुनियादारी का कारोबार बेखटके चल रहा है। इसी दावे से हम अपनी जिंदगी शुरू करते हैं और इसीके सहारे जीते-जीते एक दिन हम परम धाम की ओर चल पड़ते हैं। हमारा सच या तो यहीं रह जाता है या फिर कहीं खो जाता है। और जब मैं ही न रहा तो उस सच की कौन खोज करता है। जय रामजी की।
सच क्या था ?
हमने कभी विचार नहीं किया , बस मान लिया क्योंकि मेरे आने से पहले सब उसको सच मानते थे और हमारा क्या जाता था , सो हमने भी उन सभी लोगों के साथ शुरू हो गए और चलते गए, बहते गए, बहते गए बहुत दूर तक ।
ये हुआ सच। सच सबके साथ का सच। काम चलाना था इसलिए मेरा भी सच। सच के व्यावहारिक उपयोग के लिए यह जरुरी है कि इसकी सामाजिक स्वीकृति हो, सार्वजानिक स्वीकार हो। अन्यथा यह अनर्गल प्रलाप कहलाता है।
और हम प्रलाप नहीं करना चाहते, हम अपने भावों को संप्रेषित करना चाहते हैं।
लेकिन झूठ ?
झूठ का कोई चेहरा पहचानते हैं आप ?
यह झूठ क्या होता है ? आप जिसे सच नहीं मानते , वह झूठ होता है, है न !
' इसकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा है, लगता है यह झूठ बोल रहा है। '
हम अक्सर दूसरों के झूठ के लिए चिंतित रहते हैं। लेकिन दूसरों से मुझे क्या मतलब ?
मतलब है ।
मतलब होना नहीं चाहिए था पर होता है। क्यों? क्योंकि हम परमुखापेक्षी हैं। परमुखापेक्षी होने का अर्थ है- हम अपने को दूसरों की नजरों में बनाना चाहते है। हम अपना वजूद ही तब मानते है जब दूसरा स्वीकार करे।
आइए, विचार करें कि झूठ क्या होता है?
जब हम अपने वजूद, अपनी उपस्थिति, अपने अस्तित्व को स्वीकार करवाने की धुन में अपने भी हृदय के विरुद्ध जब कुछ बोलते हैं अथवा कोई कार्य-कलाप करते हैं, वही झूठ होता है।
झूठ असत्य और मिथ्या से अलग होता है। अलग इस अर्थ में होता है कि एक मनुष्य , सजग और समझदार मनुष्य असत्य और मिथ्या पर विश्वास करता है और प्रायः तनिक संदेह भी नहीं करता किन्तु झूठ पर वह विश्वास नहीं कर पाता। असत्य और मिथ्या धारणा, समझ और विश्वास से समबद्ध होते हैं किन्तु झूठ व्यक्ति से सीधा जुड़ा होता है।
जिस बात को बोलना या जिस काम को करना हमें ही गलत और अनुचित लगे , वह झूठ है।

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

करवाचौथ एक सुपरहिट त्यौहार है

करवाचौथ एक सुपरहिट त्यौहार है। महत्त्वपूर्ण कहना समीचीन नहीं लग रहा, सुपरहिट कहना अधिक युक्ति संगत प्रतीत हो रहा है। इसका भी कारण है। और कारण है हिंदी फ़िल्में, जहाँ इस त्यौहार को काफी धूमधाम और तवज्जो के साथ फिल्माया जाता है। अत्यधिक श्रृंगार करके नायिकाएँ ( स्त्रियाँ ) इस व्रत को अपने उस कथित पति के मंगल और दीर्घायु के लिए निभाती दिखती हैं।
लेकिन सनद रहे, भारत को एक धर्मप्रधान देश होने का ख़िताब प्राप्त है। इस सुपर-डुपर हित करवा चौथ को भी उसी धर्मप्रधानता से जोड़ कर कुछ लोग देखते हैं। तो क्या ऐसा देखा जाना उचित है ? मेरे अनुभव में यह एक फ़िल्मी-प्रभाव लिए फैशन प्रधान व्रत है जिसपर धर्म का मुलम्मा भर है।
वैसे यह स्वर भी , विद्रोही तेवर के साथ, सुनाई पड़ता रहता है कि औरत ही मर्द के लिए व्रत-उपवास क्यों रखे ? मर्दों को भी यह उपवास रखना चाहिए। सो कुछ फिल्मकारों ने ऐसा भी करवाने का ढकोसला अपनी फिल्मों में [ उदहारण के लिए, बागवां] दिखाने का सफल प्रयास किया है।
अगर आप कि आँखें खुली रहती हैं या आप भुक्तभोगी है तो आप शर्तिया जानते होंगे कि करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ चंद घंटे निराहार रहने का कितना बड़ा मुआवजा अपने पति से वसूल करती है। कहने की आवश्यकता शायद नहीं है कि कुरीतियाँ अमीरों के घर से ही जूठन के रूप में बाहर फेंकी जाती है।
और बाज़ार ऐसे मौकों पर अपना हाथ सेंकता है।
अख़बारों और टीवी चैनलों पर इस बाज़ार-नियंत्रित व्रत का मनोरंजक विज्ञापन, कार्यक्रम के रूप में आपको खूब दीखते होंगे। इसका जब भी फुटेज दिखाया जाता होगा तो उसमें महंगे वस्त्र-परिधानों-आभूषणों से लदी कुछ एक स्त्री शरीर भी अनिवार्यतः दिखाए जाते होंगे। इन्हें परिवार की खुशहाली से या दांपत्य के बंधनों को दृढ करने से कोई मतलब नहीं होता। इनका उद्देश्य है अर्धशिक्षित स्त्रियों को फैशनपरस्ती के लिए उकसाना।
पौराणिक कथाओं की सावित्री मृत्यु के देवता से अपने लकड़हारे पति सत्यवान के प्राण वापस लौटा लाती है। वह कामदेव को रिझाने नहीं जा रही होती है जो सोलहो-श्रृंगार कर जाती।
खैर, समझाने वाले मुझे समझा सकते हैं कि इसी बहाने परंपरा की रक्षा होती है तो होने दो। तो मैं कहूँगा , लानत है ऐसी धार्मिक कही जाने वाली परंपरा पर जिसमें अच्छा आभूषण नहीं दिला सकने वाला पति तलाक का शिकार होता है। यह परंपरा दांपत्य में मधुरता नहीं, कटुता और लाचारी लाती होगी। यह बाजारू हो चली परम्पराएं नष्ट क्यों नहीं हो जाती है। लेकिन यह मेरा ख्याल है इस फैशनपरस्त परम्परा की जिम्मेदारी जब बाज़ार ने उठा ली है तो मेरे लाख चिल्लाने से मिट नहीं सकती।
करवाचौथ की मंगल कामनाएँ - सतियों को नहीं, बाज़ार के कारोबारियों को !

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

साहित्य के विषय में ...

1.) कोई कुछ कहता नहीं तो इसका मतलब यह नहीं निकलना चाहिए कि कोई कुछ कहना नहीं चाहता।

2.) किसी के कुछ नहीं कहने के बहुत से कारण होते है।

3.) यह सोचकर किसी तरह की कोई खुशफहमी नहीं पाल लेना चाहिए कि उसे मेरा कृत्य पसंद ही है।

4.) किसी बड़े कवि ने काव्य व्यवस्था दी है - मौन भी अभिव्यंजना है।

5.) लेकिन अभिव्यंजनाओं का तात्पर्य तो सहृदयों के लिए है, पगुराई भैंसों के लिए नहीं।

6.) हमारे समय की साहित्यिक दुर्दशा यह है कि साहित्य की अभिव्यक्तियाँ अभिधामूलक होती जा रही है।

7.) तय है कि अभिधामूलक होने का कोई प्रयोजन होगा।

8.) और वह प्रयोजन है, साहित्य का प्रतिवादी हो जाना।

9.) कुछ असाहित्यिक लोग विमर्श के धुंधलके का बेजा फायदा उठाकर व्यक्तिगत शत्रुता को साहित्यिक जामा देने में लगे हुए है।

10.) साहित्यिक लोगों को ऐसी प्रवृत्ति की पहचान होनी चाहिए|

11.) मौके का फायदा उठाकर गैर-साहित्यिक प्रभावशाली लोग होते है... साहित्य में प्रवेश पा जाते हैं।

12.) अपना बदला गाली गलौच देकर निकाल लेते हैं ..... और हम किसी अन्य की बेईज्ज़ती और बेबसी पर तालियाँ पीटते हैं।

13.) नवागंतुक इसे ही साहित्यिक अभिरुचि का प्रतिमान मान बैठते हैं।

14.) किन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

15.) साहित्य एक सहयोगी प्रयास है।

16.)साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह अन्य क्रिया-कलापों के साथ तो सहयोग बनाए ही , साथ साथ , आपस में भी पारस्परिक तालमेल और संवादिता बनाए रखे।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

प्रतिस्पर्धा का चक्रव्यूह

जब भी कोई रेस में हिस्सा लेता है तो उसकी हार्दिक इच्छा जरुर रहती होगी कि वह जीते। लेकिन वह नहीं जीत पाता। इस तरह की प्रतिस्पर्धाओं में सत्ता या पावर निर्णायक की भूमिका निभाया करता है।
यह सत्ता का अनुशासन है कि जब उसे कोई चुनौती देने के विषय में सोचता भी है तो उस खिलाड़ी को प्रतिस्पर्धा के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाता है। भोला-भाला मनुष्य इस गफलत में आ जाता है कि वह योग्य और सामर्थ्यवान है , सो वह प्रतिस्पर्धा में विजयी होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। इसी मानसिकता से संचालित होकर वह पूरी लगन और निष्ठां से प्रतिस्पर्धा की तैयारी में जुट जाता है।
लेकिन सत्ता तो एक ही कमीनी होती है। निर्णय की शक्ति अपनी मुट्ठी में रखती है। उस शक्ति सहारे उभर रहे नए शक्ति-संपन्न खिलाड़ी का मान-मर्दन कर उसकी औकात बता देती है। और हम जैसे लोकतंत्र में यकीन रखने वाले लोग खिसिया कर अपनी झेंप मिटाते है। और अगली प्रतिस्पर्धा में जीत पाने का सपना संजोते हुए फिर से तैयारी में जुट जाता है। वह यह सोच ही नहीं सकता कि निर्णायक शक्ति रखने वाली सत्ता उसके विरुद्ध है और बेईमान है। वह तो बस अपने को हारा हुआ खिलाड़ी ही मान पाता है।