रविवार, 17 जनवरी 2010
यह कविता नहीं, सच का बयान है
मुँह से निकल रहा भाप
थरथरा रहा था सारा बदन
फिर भी कहीं जाना था अनिवार्य
सो चला जा रहा था यूँ ही अकेले मलते हुए हथेलियों को
और लोग भी आ-जा रहे थे
फिर भी पसरी थी वीरानी
कोई ठहरता न था मेरी आँखों में
मैं चला जा रहा था लरजते क़दमों से
यूँ ही कुछ सोचना था
तो सोच रहा था तुम्हे
सच बताऊँ तो तुम्हे सोचना जितना दुःख देता है
उससे कम सुकून भी नहीं देता
गुजर गए दस साल
लेकिन सांसों की तरह बनी रही तुम्हारी याद
यूँ कि बगैर उसके तो मैं था ही नहीं
चला जा रहा था मैं
कि कोहरे से लिपटी तुम्हारी काया
वैसे ही खुले हुए तुम्हारे बाल,
सब्ज साडी के ऊपर काला लम्बा कोट
तुम्हारा दिख जाना
शिशिर की हड्डी में चुभने वाली ढंड में गर्म धूप का अहसास ही तो था
नहीं हो पा रहा था यकीन
भूल गया था कि मुझे जाना कहाँ है ?
मचल उठा था मैं
शायद तुमने देखा नहीं
कैसे उस स्कूटर से टकराते -टकराते बचा था मैं
स्कूटर वाले की बदतमीजी मुझे दुआ सी लग रही थी
थोडा सा भर गया तुम्हारा बदन
हाँ हाँ ! तुम्ही थे
तभी तो मेरे पुकारने पर ' नेहा '
तुमने देखा था पलटकर
मैं भूल गया था सर्दी , कोहरा ,.... सब कुछ
देखो ! फिर मत कह देना कि मैं कविता कर रहा हूँ
नहीं , नहीं, यह कविता कतई नहीं
यह तो मेरे तजुर्बे का बयान है।
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
राम-पियारी हजार मांगती है....!
परेशान-परेशान हो जाता हूँ यार। पर समझा भी कैसे सकता हूँ! न कान है न जुबान।
लगता है, आप भी धोखा खा गए, जैसे मैं खा गया था धोखा।
बात यह है कि मेरा एक दोस्त है जीतू , हाँ, जितेंदर सिंह। उसके पास है एक मरुति८०० , बीस साल की बुढ़िया गाड़ी - जो उसे बहुत प्रिय है। या यों कहें कि मित्र उसे प्रेम करने पर मजबूर है। .......... अरे! हाँ, आप बहुत ठीक समझे। बात की हर तह को खोलना जरुरी थोड़े ही होता है।
जवानी का जोश था , मारुति का टशन था , कहीं से पैसे का जुगाड़ भी हो चला था , सो जीतू ने मारुति खरीद डाली थी।
लेकिन किसी ने कहा है और शायद ठीक ही कहा है , " सब दिन होत न एक समाना"। सो भाई साहेब जीतू जी के भी हाथ तंग रहने लगे। हाथ तंग न हुए बल्कि परिवार बढ़ने से खर्चे बढ़ गए। पत्नी बच्चों में उलझ गई, बच्चे अपनी दुनियाओं में और जीतू के पास प्रेम करने को फिर से बच गई सिर्फ राम पियारी।
लेकिन इन दिनों उसकी खिच-खिच ज्यादा ही बढ़ गई है ।
जीतू एक दिन एकांत पाकर बता रहे थे , यार! हर बात की हद होती है। कई बार जी में आता है बेच दूँ साली को , पर दुसरे पल सोचता हूँ कौन लेगा इसे ? बड़ी ही वफ़ादारी से निभाया है जालिम ने पूरी जिन्दगी और अब मैं हाथ छुड़ा लूँ तो ये गई वाजिब न होगा। एक बार को बीबी ने इंकार किया होगा पर इसने नहीं। सच बताऊँ तो मेरी राम-पियारी मेरे दिल में बसी है। इसे बेचना तो इसको धोखा देना होगा न , एक किस्म की दगाबाजी .........! उम्र हो जाने के बाद इन्सान भी तो बीमार हो जाता है, नहीं!
तो भी हर सप्ताह के हजार मांगने के कारण जीतू थोड़े नाराज अवश्य हैं , सो देखा चाहिए कब तक उनका धैर्य नहीं चुकता है?
वैसे मैं जितेंदर सिंह की इस वफ़ादारी की दलील से बहुत प्रभावित हुआ। फिर भी मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं वफ़ादारी की तारीफ करूँ या इसे निहायत बेवकूफी समझूँ!
एक सवाल और मेरे जेहन में आता है कि लोग किसी मज़बूरी या विकल्प हीनता की स्थिति में एक दूसरे का साथ निभाते हैं या इसमें उनकी मर्जी भी शामिल होती है ?
मैं आपसे पूछता हूँ - आपकी राय क्या है इस विषय में ?
गुरुवार, 26 नवंबर 2009
अंग्रेजी से भिड़ी सी दिखती है हिन्दी
यूरोप ने अपना सांस्कृतिक साम्राज्य तो अंग्रेजी के माध्यम से आज तक कायम रखा है। इस वजह से, दूसरी भाषा के विषय में तो मैं दावे नहीं कह सकता पर, हिन्दी इतनी व्यापक और गहरी संस्कृति रखते हुए भी मानो अंग्रेजी का मुंह जोहती रहती है । यह मेरी अल्पमति में सर्वथा दुर्भाग्य पूर्ण है।
इसकी जिम्मेदारी अनुवादकों और अनुवाद-बाज़ारों की है।
अनुवाद का तात्पर्य का दुहराने से है। अनुगमन करने से है।
भारत की संविधान ने किसी कारणवश हिन्दी को राष्ट्रभाषा तो मान लिया किंतु मैंने या आप सबने भी देखा होगा कि यह हमेशा द्वितीय श्रेणी का आदाब पाती रही।
मसलन, संविधान अंग्रेजी में लिखी जाती है और बाद में , इसका अनुवाद करवा जाता है हिन्दी और अन्य भाषा में।
अभी पिछले दो दशकों से एक मुहावरा वैश्वीकरण अथवा उत्तर-आधुनिकता हमारे हिन्दुस्तानियों में जितना मशहूर है शायद यूरोपवासियों में न हो किंतु इसका वास्तविक सन्दर्भ कहाँ है ! अंग्रेजी में। और आपको जानना है तो अंग्रेजी में इसका मौलिक पाठ मिलेगा नहीं तो हिन्दी सुधीश पचौरी द्वारा किया गया अनुवाद, जिसे वे मौलिक होने के दावे साथ परोसते है।
इसका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि मैं या इस तरह की बात करने वाला अंग्रेजी-विरोधी है। मैं आप सुधि-विद्वानों से पूछता हूँ कि क्या दोस्ती करने का मतलब गुलामी करना ही होता है।
भारत में किसी भी भारतीय भाषा के अख़बार से बहुत अधिक प्रतिष्ठित अंग्रेजी का अख़बार है।
कोई रचनाकार जब अच्छी रचना लेकर प्रकट होता है, आलोचक यह पता लगाने की जुगत में लग जाता है कि इस लेखक ने किस अंग्रेजी लेखक का मजमून मारा है।
फिल्मों तक की स्थिति यही है।
क्या यही नियति है ?
हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमारी हिन्दी एक दोयम दर्जे की भाषा है ।
न जाने क्यूँ , मानने का मन नहीं होता।
गुरुवार, 19 नवंबर 2009
मेरा समय : मेरे विचार
बहुत सोचा कि आखिर ऐसा क्यों है ?
तो मैंने पाया कि आज भी समाज पर , उसके रिवाज़ और रवायत पर मर्दों का ही कब्ज़ा है। वे कुछ स्त्रियों से अपने बृहत् मनोरंजन का इंतजाम करवाते है ।
यदि ऐसा है तो सवाल उठता है कि वे पुरूष इस तरह की कुत्सित मानसिकता से ऐसे घिनौने षड़यंत्र क्यों करते हैं ?
ऐसा सिर्फ़ इसलिए , क्योंकि इस तरह की ऐय्याशी में न्यूनतम जोखिम है ।
आज़ादी की आकांक्षा तो शाश्वत स्वप्न है मानव-मात्र का , इसलिए स्त्रियों में भी है और यह स्वाभाविक तथा नैसर्गिक है ।
बड़े और बुद्धिमान सौदागर चीजों का नहीं , सपनों का ही कारोबार करते हैं ।
आपके सपने को पूरा करने का आश्वासन देकर आपका वजूद आपसे ले लेते हैं और स्वप्न को साकार करने के लिए स्वेच्छा से अपने आपको सौंप देते हैं।
यह एक ही ऐसा व्यवसाय है जिसमे सबको सिर्फ़ फायदा ही होता है, नुकसान किसी को नहीं होता ।
बाज़ार को जब यह समझ में आया , वह आपको स्वप्न का लालच देकर आपको बन्दर बना दिया और ख़ुद बना मदारी, वह बजता है डमरू और हम उसके इशारों पर थिरकना समसामयिक होने जैसा जरुरी समझते हैं व
थिरकते हैं।
याद कीजिए फैशन परेड को, जिसमे स्त्री प्रायः और कभी कभी पुरूष भी रोबोट की तरह चलते है, जरुरत और निर्देश के अनुसार घूमते और हाथ हिलाते हैं।
वे सिर्फ़ एक देह की तरह होते हैं, मालूम देता है कि उस शरीर में मन या आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होगी।
लेकिन उस बे-रूह कारनामों को करने वाले हमारे समय में काफी महत्त्वपूर्ण हस्ती हैं।
इस तरह रोबोट की कैट-वाक करना हमारे कई हम-वक्तों का ख्वाब होगा ।
यह मेरा समय है,
मैं अपने समय से शर्मिंदा नहीं हूँ , मैं अपने समय को समझना चाहता हूँ।
यह भी सच है कि स्त्रियों को बेपर्दा कर कुछ मर्द इसका लुत्फ़ लेते हैं । इसमे कुछ आज़ाद-ख्याल खवातीन इन खिलाड़ियों के खेल का शिकार भी होती हैं। फिर भी, आज़ाद होने की जिद बहुत हद तक आज़ादी दिला चुकी है। यह जिद बनी रहे, इंसा-अल्लाह , बरकत होगी जरूर
यह हमारा समय है, जब ज्यादा संघर्ष सांस्कृतिक हो गई है। बस इसीसे सावधान रहने की, जहाँ तक हो सके, जरुरत है।
यही हमारा समय है, और ऐसे ही अजीब मेरे विचार हैं।
सोमवार, 9 नवंबर 2009
माफ़ी-नामा (कविता)
मेरी हालत ठीक नहीं है
मैंने कोई अक्षम्य अपराध कर लिया है तुम्हारे प्रति
मुझे अवश्य मिलना चाहिए दंड
किंतु मत करो मेरा त्याग
मुझे रहने दो अपने इर्द-गिर्द
मैं करता हूँ वादा , पकड़के अपने दोनों कान
कि नहीं होगी मुझसे भूल से भी कोई वैसी चूक
जो तुम्हें नागवार गुजरे
तुम्हें पाकर
हो गया था मैं दम्भी कुछ अधिक
और कर बैठा था प्रयोग अपनी शक्ति
तुम्हारे विरुद्ध
नहीं समझ में आता है इसका कोई निदान
नहीं सूझता है दो कदम चलने का भी रास्ता
बेदम और लाचार
जीने का कर रहा हूँ जी-तोड़ प्रयत्न
इसी उम्मीद से
कि शायद होगा तुम्हारा बड़ा ह्रदय
और मर सको तुम माफ़ मुझे
जाहिर सी है बात
कि मैं खो चुका हूँ
तुमसे बात तक करने का अधिकार
नहीं है मालूम कोई पता-ठिकाना भी
कि लिख भेजूं , दो पांति का माफीनामा ही
तभी तो लिख रहा हूँ कविता
कि कोई सहृदय पहुँचा मेरे आंसू के दाग
कि करे शायद चर्चा मेरी कविताओं के मजमून का
नहीं जाएगा कुछ भी माफ़ी देने में तुम्हारा
लेकिन मिल जाएगा मुझे मेरा जीवन वापस
बस ! नहीं लिखी जा पा रही कविता पूरी
यह अधूरी कविता शायद मेरा माफीनामा है
अगर तुम कर लो कुबूल तो
वैसे मैंने गलती माफ़ी के काबिल नहीं ।
शनिवार, 31 अक्टूबर 2009
टीवी चैनलों पर जजों की वैकेंसी
जजों के पद के लिए अनिवार्य योग्यता इस प्रकार है:
१) प्रत्येक पैरवी-पत्र भेजने वालों को इतना मशहूर होना चाहिए जिसे सिलेब्रिटी कहा जा सके। उदहारण के लिए ध्यान दें, कोई भी राहुल महाजन से कम लोकप्रिय न हो।
२) उसके पास और कोई काम न हो। उदहारण के लिए, रिजेक्टेड हीरो-हिरोइन, संगीतकार-गीतकार, निर्देशक-निर्माता वगैरह ।
३) गेस्ट जजों की नियुक्ति भी साथ-साथ चलती रहेगी, जिन्हें एक एकाध एपिसोड के लिए ही रखा जा सकेगा , इसमें काम-काजी लोग भी नियुक्त हो सकते हैं।
ध्यान दें :-
जिसकी पैरवी इस प्रोग्राम के लिए नहीं सुनी गई , वह धैर्य न खोएं । आम लोग को बेवकूफ बनाने के लिए बहुत सारे प्रतिभाशाली लोग मेहनत कर रहे हैं। जैसे ही कोई दूसरा रियलिटी-शो का आयोजन होगा, आपको ही मौका दिया जाएगा।
पैरवी-पत्र भेजने की कोई भी अन्तिम तिथि नहीं है। आप संपर्क में रहे , आपको भी जज बनने का मौका अवश्य दिया जाएगा। अपना पैरवी=पत्र कृपया इस पते पर भेजें।
मुर्दों का टीला,
आई-बाबा रोड,
कब्रिस्तान , बुम्बई- 999००४
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
पति,पत्नी और वो : एक अमानुषिक मनोरंजन
आइये , अब थोडी सी चर्चा इस वास्तविक तमाशे से जुड़े लोगों की नियत को परखें।
सबसे पहले उस माँ-बाप की नीयत को जानें जिन्होंने अपने बच्चे इस तमाशे के लिए दिए हैं। उन्हें जानवर कहना , मेरी समझ से जानवरों की तौहीन है। वे नौनिहाल, दुधमुंहे शिशु अपने माँ-बाप को पैसा कमा कर देंगे। तय है कि वे बच्चे अमिताभ बच्चन बनने का ख्वाब नहीं देखते होंगे। लेकिन माँ-बाप उनके द्वारा कमाए गए पैसे को गिन कर आनंदित तो अवश्य होते होंगे।
कोई किसी बच्चे से भीख मंगवाता है, श्रम करवाता है तो बहुत से लोग उन कृत्यों का विरोध और निंदा करने को सामने आते हैं। इन नौनिहालों का जब टी आर पी बढ़वाने में इस्तेमाल किया जा रहा है तो वे लोग किस गुफा में छिप गए है।
जब अपराधियों और आतंकवादियों को यातना दी जाती है तो मानवाधिकार वाले अपना झंडा उठा कर फटाफट पहुँच जाते हैं कि अमानुषिक यातना न दिए जाएँ तो अभी जब निकम्मे सेलिब्रिटी के हाथों अबोल शिशुओं का तमाशा बनाया जा रहा और सारे संसार के लोग टीवी पर बैठकर तमाशा देख रहा है -ऐसे में कहाँ हैं मानवाधिकार के कार्यकर्ता ?
कहाँ हैं वे लोग जो पशु के साथ दुर्व्यवहार होने पर आसमान सर पे उठा लेते हैं वे इन शिशुओं को चीखने चिल्लाने के लिए भेजे गए बच्चों के लिए क्यों नहीं कुछ करते?
सरकार इस तरह के नृशंस ' रियलिटी शो' के खिलाफ क्यों नहीं कोई कानून बना रही।
हे प्रभो! मनुष्य पैसा बनाने के लिए और कितना अधोपतित होगा ?
हे ईश्वर! किसी को भेजो या तुम ही किसी रूप में आओ और इन दुधमुहे नौनिहालों को इन भेड़ियों से बचाओ।
मनोरंजन के लिए मनुष्य इतना अमानुषिक हो सकता है- कभी सोचा न था।
