शनिवार, 25 अप्रैल 2015

आदित्य शुक्ला की कविताएँ.

आदित्य अपनी कविताओं में आप वैसे ही रहते हैं जैसे जीवन में रहते हैं या यात्रा में. यह सहज स्वाभाविकता इनकी कविताओं की अन्यतम विशेषता है. आप कविता लिखकर "परिवर्तन" जैसी बड़ी कामना करते नहीं प्रतीत होते फलतः इनकी कविताएँ क्लोन-कविता जैसी नहीं लगेंगी. आप नए कवि की उस श्रेणी के हैं जो अपनी कविताओं की भाषा, शैली, विषयवस्तु, अभिव्यक्ति आदि में अपनी विशिष्टता को बनाए रखना चाहते है. इनकी कविताओं से जब आप गुजरेंगे तो कवि के अंतर्मन की यात्रा का अनुभव करेंगे. मैं आदित्य को इनकी कविताओं के लिए बधाई देता हूँ और आगामी काव्य-जीवन के लिए शुभकामनाएँ   - रवीन्द्र के दास. 


परिचय 
आदित्य शुक्ल, गुडगाँव.  
एक्स्चेंगिंग टेक्नोलोजी में डाटा एनालिस्ट के रूप में कार्यरत. 
ब्लॉग और फेसबुक पर सक्रिय रूप से लेखन. 
हिंदी और विश्व साहित्य में रूचि.

संपर्क- +91-7836888984/shuklaaditya48@gmail.com

ब्लॉग-isibahaaneekbaat.wordpress.com

 

    निषेध

ऊबकर कहता हूं मैं
पियोगे क्या चाय
सहमति में अपना जरा सा सिर हिला देते हो तुम
चाय बनाना,
किचन में आग न लगा देना -
कहते हो तुम चिढ़कर
मन ही मन गालियां देते हो

हिलता-डोलता है तुम्हारा बेढब सा सिर
कहते हो 
निषेध, निषेध
नेति, नेति!!
कहते हो मैं इस सभ्यता का
ईश्वर का
क्रांतियों का बहिष्कार करता हूं
तभी, नौकरी-तनख्वाह आदि को लेकर
तुम्हारा सिर चनक उठता है
तुम चिल्लाते हो
और तुम्हारे मां की सूरत तुम्हारे आंखों में चमक जाती है
चाय बनने से पहले पहले 
तुम फूंक डालते हो पांच सिगरेट
कहते हो 
निषेध, निषेध
नेति, नेति!
और घुटने टेक देते हो
इसी जंजाल के सामने
जिसके लिए बार-बार
हम सड़को-चौराहों पर घूम-घूम
नेति,नेति करते रहे!         



   चले गए आदमी के पीछे

एक आदमी चला गया-

पीछे, एक चले गए आदमी के
एक आदमी छूट गया। 
चले गए और छूट गए आदमी के बीच
एक लकीर रह गई
जैसे रह जाती है याद...

रह गई लकीर पर आ बैठी चिड़िया एक
छूट गया आदमी देखता रहा लकीर,
लकीर पर बैठी चिड़िया
छूट गया आदमी उदास हो गया

एक एक कर और आ गई चिड़िया
चिड़िया के पीछे चिड़िया
चिड़िया के पीछे और चिड़िया

चिड़ियों की लकीर चलने लगी
फुदकने लगी
चले गए आदमी से छूट गए लकीर पर

जिनके पीछे चलने लगा छूट गया आदमी।




    जरा-सा होना


जरा सा होना है कि
अपनी छुवन उतारकर टेबल पर रख देना
जैसे नरम कुहनी से दबा हुआ 
टेबल का सिरा
जरा सा होने की तरह से 
न होने के उस ओर

जरा सा होना है           
आलमारी के एक कोने पर छूटा हुआ हेयरपिन 
जरा सा एक चित्र उतारकर छोड़ देना
हेयरपिन के साथ
गीले बालों में घूमती कंघी की

जरा सा होना है           
बिस्तर के एक कोने पर अपने नन्हें पांवों के निशान छोड़ जाना
उन निशानों का फूल की तरह उगना
बूढ़ा होना, सूख जाना
सूखकर महकना

जरा सा होना
धीरे धीरे सीढ़ी से उतर चला जाना
और स्मृतियों में कौंधते रहना पदचाप का शनै: शनै: 
हल्का पडते जाना।

नहीं होने के उस ओर
होना पड़ा रहता है कागज के टुकडे सा
अनदेखा
और कुछ उंगलियां चेहरे पर सरकते ठहर जाती हैं
रुखे होंठों के पोरों पर

जरा सा होना बचा रह जाता है हर बार
नहीं होने के उस पार 
टापू पर जलती अकेली मद्धम रोशनी-सा!


           सूर्यांचल


उसने दिन का काम निपटा लिया है
उसका माथा ठंडा है अब

मुझे सूर्य की परछाइयां मिली हैं
एक-आध, इधर-उधर, छिटकी-बिखरी
मुझे तलाश है सूर्य की

सूर्य ठीक पश्चिम ढलान से उतर जाएगा
अनंत में

मैंने भी अपना काम निपटा लिया है
सूर्य की परछाईयां पकड़कर दौड़ूंगा मैं
ठीक पश्चिम ढ़लान की ओर

लिखकर रख दिया है एक पत्रनुमा किताब में 
अपनी जिंदगी के रहस्य-वृत्तांत 
किसी अनजान पथिक के लिए

मैं सूर्य से पहले पहुंचूंगा पश्चिम के ढ़लान
और हम एक साथ उतर जाएंगे
अतल अनंत में
किसी प्रपात की तरह.


        हार


मैं अपनी हार इस तरह स्वीकार कर लूंगा
लगभग जीतते हुए

लौट जाऊंगा अपने सैनिक
घुड़सवार वापस लेकर
जब तुम्हें लग रहा होगा तुम हार गए
तुम्हारी सेना की टुकड़ी का आकार जब घट रहा होगा
दिन-ब-दिन

जब तुम्हारे माथे पर पड़ने लगेगी शिकन
नींद उड़ जायेगी

मैं जानता हूं जीतने के लिए
मुझे पहले इससे गुजरना होगा

तुम्हारी हार वाली हालत से

मुझे हारना होगा पहले

तुम्हारे हारने से ठीक पहले लौट जाऊंगा मैं
युद्ध-स्थल में तड़पती लाशें छोड़कर,
तुम्हें घर लौटने के लिए छोड़ जाऊंगा



     डेस्कटॉप के सामने सोचता हुआ आदमी


डेस्कटॉप के सामने बैठे बैठे
जब,
आपका चश्मा जरा-सा ढुलक आता है 
आपकी नाक पर 
माथे पर बल पड़ जाता है

आप सोचते हैं
आप सोच रहे हैं
आप सोचते तो हैं
आप सोच रहे हैं
तब असल में सोचते ही नहीं।

आपकी नाक से बह रहा होता है खून

माथा दर्द से चनक रहा होता है 

                     

ठीक जिस वक्त आप सोचते हैं कि आप सोच रहे हैं
आपकी आंखें ठिठक जाती हैं
एक किसी शून्य में
जहां,
जल-त्रासदी से त्राहि त्राहि कर रहे होते हैं लोग!

ठीक जिस वक्त आप चाय पीते हैं
विज्ञान के आविष्कारों की बात करते हैं
ईश्वर की तारीफ के कसीदे गढ़ते हैं
फिर सोचते हैं कि सोच रहे हैं आप
निरीह ही रहते हैं हमेशा की तरह
आप अपने ही
विचार-प्रवाह में बह नहीं पाते
उसकी तलाश में
गुमशुदा भागते हैं
बदहवास
और सोचते हैं कि भाग रहे हैं आप
ठीक उसी वक्त
आप ही का कुछ हिस्सा
आपकी परछाईं से 
आपसे टूट
गिर जाता है
जैसे हाथ में लिया हुआ चाय का कप 
छूट- गिर जाता है 
रास्ते में बिखर
चकनाचूर हो जाता है
आप सोचते हैं     
आप साबुत मंजिल तक पहुंच गए!
आप सोचते खूब हैं
बस सोच नहीं पाते
सोचकर, बस वहां तक पहुँच नहीं पाते.


     खंडहर की आवाज़


मकबरे से उठती है एक आवाज
आवाज के पीछे आवाज
और ढ़ेर सारी आवाजें 
जैसे भरभरा कर उठ जाता है कबूतरों का झुंड
एक कबूतर के उड़ने के पीछे.
मंडराने लगता है

भग्नावशेषों के ऊपर

किसी खोए रहस्य की तलाश में।

सीढ़ियों के पत्थर चुप हैं
वे जानते हैं
छूट कर गिर गया था एक फूल किसी हाथ से
गिर गया 
दफ्न हो गई उसकी स्मृतियां सीढ़ियों के पत्थर में

पत्थर-भग्नदूत जानते हैं
उठेगी ये आवाजें बार-बार
मंडरायेंगी, थक गिर जायेंगी

गिर-कुचल गए फूल का रहस्य 
दबा-बचा रहेगा यहां इस,
भग्नावशेष में!


     

मैक्स ब्रोड

(काफ्का का अजीम दोस्त.)

मैक्स ब्रॅाड, तुम मुझे नष्ट कर दो!

नष्ट कर दो मुझे
मेरे इस अंधेरे कमरे में नष्ट होने के कई सारे सामान हैं
उठा लाया था मैं मरे हुए कौव्वे की लाश
बगल वाले पार्क से
सूखकर सड़े हुए संतरे ठीक सिरहाने पड़े हैं
एक अदद काला चूहा भी
सब रहने लगे हैं मेरे साथ अब
इस अंधेरे बंद कमरे में
मेरी आवाजें गूंजती हैं
छटपटाती है मेरी आत्मा

मैक्स ब्रॅाड, तुम मुझे नष्ट कर दो अब
मेरा लिखा हुआ सब कुछ
शायद मेरे जाने के बाद बच जाए
लोग पढ़कर कहकहे लगाएं

न्हें नहीं सुनाई देती मेरी आवाज
मेरी आत्मा के घाव उन्हें नजर नहीं आते अभी

मैक्स ब्रॅाड, मैं इंसानियत की यह दुर्गंध ढ़ो ढ़ोकर थक गया
ऊबकाई आती है इस दर्दनाक सभ्यता को देखकर
मुझे

मुझे नष्ट कर दो मैक्स
मैं नहीं कर पाऊंगा खुद को अभी नष्ट 
मुझमें ताकत नहीं

मुझे नष्ट कर दो मैक्स
इससे पहले कि ये चूहे मुझे कुतर खायें
सड़े हुए संतरे की फलियां मुझे सड़ा डाले!




         कमरे का आदमी


मैं इस कमरे में बाहर से आता था,
मुझे रखा हुआ मिलता था-
अंधेरे का एक सूना-चौकोर टुकड़ा
कुछ रखे हुए कहकहे
एक नितांत अकेली परछाईं
घनघनाता हुआ पंखा
प्लाईवुड का एक टेबल 
दीवारों की खिड़कीनुमा आंखें.

मैं जब इस कमरे में बाहर से आता था, 
सब-कुछ करीने से सजाया होता था
रखा होता था - 
अंधेरे टुकड़े के बक्से में। 
मुझे दिखाई देता था एक हंसते हुए आदमी का हाथ
उसकी मूछों पर अटका हुआ सन्नाटा।

अब, मैं इस कमरे में बाहर से नहीं आता
मैं यहां रहने लगा हूं
इस अंधेरे के चौकोर बक्से में 
अब मुझे यह बक्से सा चौकोर नहीं दीखता
अब भी इसमें रखे हुए हैं
कुछ कहकहे, एक नितांत अकेली परछाईं
घनघनाता हुआ पंखा
प्लाईवुड का वही पुराना टेबल।

मैं उस चौकोर टुकड़े के भीतर के उजाले में रहता हूं अब
इसमें एक आसमान उग आया है 
अब चमकते हैं तारे

रात हो जाती है।

तुम बाहर से आओगे
तुम्हें ठीक उतना ही चौकोर अंधेरा मिलेगा
तुम्हें सन्नाटों की ध्वनि सुनाई देगी
खट-खट
(
जाते हुए की-सी ध्वनि...)
मैं चला जाऊंगा
तुम यहीं के होकर रह जाओगे
उस अंतराल में छोड़ दिये गए-से:
दीवार की तरफ मुंह करके सो जाओगे।


                     एक पेड़ पर एक डाल थी


एक पेड़ पर एक डाल थी
ठीक जैसे डालें होती हैं दूसरे पेड़ों पर
डाल पर एक झुरमुट छिपा रहता था
बहुत सारे झुरमुटों से दूर
डाल के एक कोने पर

झुरमुट में रहती थी एक चिड़िया
झुरमुट से, गाती रहती थी
हरदम

चिडिया गाती थी
बच्चे सुनते थे,
बच्चे खेलते थे गली में
गली की सड़क पर लाल पत्थर से लकीरें खींचकर
चिडिया गाती थी
 
झुरमुट हिलता था जरा-जरा.

बच्चों में एक बच्ची थी
जैसे पेड़ पर एक डाल

डाल पर एक झुरमुट
बच्ची निकल जाती थी बच्चों के झुंड से

चिड़िया के गाये हुए गीत की लकीर पर चलकर

दूर बागीचे में।

चिड़िया गाती थी
बच्ची सुनती थी
(
बच्चे खेलते थे)
झुरमुट हिलता था।

और अचानक पंख फड़फड़ा कर उड़ जाती थी चिडिया
गाना रुक जाता था
चिडिया के साथ-साथ बच्ची का मन
उड़ जाता था

गाना डाल पर छूट जाता था.








 

1 टिप्पणी:

Shruti Gautam ने कहा…

व्यर्थ प्रलाप और कठिन बिम्बो से मुक्त, सरल,सहज, संवेदनायुक्त सुंदर कवितायें | कविताओ का सबसे सबल पक्ष उसकी ग्राह्यता है जो पाठक को सीधे जोड़ देती है कि कविताये पढने के बाद भी शब्दों की एक लकीर बची रह जाती है |
युवा कवि को अनंत शुभकामनायें | लिखते रहिये |