सोमवार, 16 मार्च 2015

अशोक कुमार की कुछ कविताएँ





अशोक कुमार
जन्म तिथि : 29 सितम्बर 1967
सम्प्रति : कोल इंडिया की अनुसंगी इकाई सेन्ट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड के हजारीबाग क्षेत्र, हजारीबाग (झारखंड) चरही में वरीय प्रबन्धक (कार्मिक) के पद पर कार्यरत
 मोबाइल: 08809804642
इमेल : ashok_cil@yahoo.in
            ak1021852@gmail. com



पहाड़ तुम खड़े रहना यों ही
तुम्हारे खड़े होने से
कई पड़े लोगों को खड़े होने का हौसला मिलता है  

अशोक कुमार की कविताएँ जीवन से लुप्त हो रही ज़िन्दगी के लिए बेहद फ़िक्रमंद हैं. प्रसिद्ध और सरल रूपकों और रूपक-विधानों के माध्यम से अपनी कविताओं और उनमें निरूपित चिंताओं को बड़ी सरलता और सहजता से पाठकों तक पहुँचाने में कवि समर्थ हैं. वर्तमान वास्तविकता का निषेध किए बिना बेहतरी की स्वाभाविक संभावना करते हैं. कविता के ग्लोबल फैशन से अलग इनकी कविताई-प्रविधि अनायास ही आकर्षित करती है.
आग गायब हो रही थी लोगों के जेहन से
शहर के हड़ताली चौक से बुझी हुई आग समेट रहे थे लोग.
कवि ने जूते को अपनी कविता का विषय बनाते हुए बड़े ही अनोखे ढंग से उनका मानवीकरण किया है. जूता विमर्श अनायास चमत्कृत भी करता है. 
जूते - 2
जूते मेरे पैरों ही नहीं मेरे चेहरे की भी शान हैं
जब वे चमकते हैं
मेरा चेहरा भी दमक रहा होता है शान से . 
कवि अशोक कुमार को बधाई. --- रवीन्द्र के दास
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 कविताएँ
कछुए दौड़ रहे थे सदियों से

कहानियों में कछुए चल रहे थे
खरगोश सोये थे
कछुए दौड़ जीत जाते थे

मगर मेरे पास जो कविता थी
उसमें कछुए दौड़ रहे थे सदियों से
इतिहास में नदी किनारे खींची गयी एक रेखा से
खरगोश चाक-चौबन्द थे पेड़ के नीचे
सोते थे मगर चौकन्ने थे

कछुए पहाड़ के पास खींची रेखा तक पहुँचना चाहते थे
अर्थशास्त्रियों की खींची रेखा को छूना भर चाहते थे
और इसलिये लगातार चल रहे थे
बिना सोये

खरगोश पहाड़ के पार थे
उस पेड़ के नीचे
सोये थे
जहाँ बरसती थी समृद्धि की शीतल छाँह

कछुए चल रहे थे सदियों से
लगातार
और कविता में वे अपनी नियति बदलना चाह रहे थे .

यह जो आदमी है 
मेहरबान , कदरदान !!
यह जो आदमी है
यह अपनी किस्म का इकलौता है
इसकी उम्र पचास लाख वर्ष से भी ज्यादा है
मेहरबान ! कदरदान !!
इसे मैं खोज लाया हूँ
बस्तर के गहन जंगलों से भी घनी जगह से
अंडमान के द्वीपों में पल रहे
आदिम जीवन से भी अगम्य स्थल से .
इसका रंग काले पत्थर से भी काला
इसकी भुजाएं शरीर -सौष्ठव
बनाते किसी युवा से भी
कसी और कड़ी
देखो पूँछ इसकी
अभी ही गयी है उदविकास में
और अभी भी हैं इसकी आंखें किसी उदबिलाव सरीखी .

मेहरबान !
इसे भूख नहीं सताती
हवा पीकर जिन्दा रह सकता है यह कई बरस
प्यास इसे नहीं तरसाती
इसे नहीं पता फलों से निकले गए ताजा रस
और ब्रांडेड जूस का अंतर
भावों के चढ़ने से
कम तौलाये दालों से भी नहीं सिकुडती इसकी आंतें

कदरदान !
नहीं पता इसे तेल के भाव चढ़ने से क्या असर होता है
यह दौड़ता ही चला जाता है सैकड़ों मील
बिना रुके , अनथक .

हुजूर !
नहीं पता इसे लेखों में कैसी होती हैं जीवन की कथाएँ
और कविता तो बस तैर रही होती है इसके आँखों में
संवेदना बनकर .

यह जो आदमी है
अपनी तरह का इकलौता है
इसे ढूंढ लाया हूँ
दुर्गम , अगम , अलभ्य - स्थल से .
दुर्लभ है यह -----
शायद आज यही आपके किसी काम आये

श्रीमान मेहरबान ..... कदरदान .... !
यह जो आदमी है
यह भी आदमी ही है !

सीली हुई माचिस की तीलियाँ
 
माचिस की तीलियाँ बिन बरसात
गीली पड़ी थीं
माचिस की तीलियाँ भीषण गरमी के बावजूद महरायी हुई थीं

दिन भर काम के बाद
औरत जब फूँकना चाह रही चूल्हा
बेदम पड़ी थीं तीलियाँ
बिन पानी बादलों की तरह .

खतरनाक दौर था जब
विधेयक खो रहे थे अपना पाठ
और न्याय को संभाले हुए थी
एक तिरछी तराजू .

चाक गढ रहे थे कच्चे बरतन
पकानेवाली भट्ठियाँ आग के बिना सूनी और ठंडी पड़ी थीं

ठंडेपन का आलम यह था कि जब लोग मिला रहे थे हथेलियाँ
बर्फ के ठंडेपन की सूईयाँ चुभ रही थीं

आग गायब हो रही थी लोगों के जेहन से
शहर के हड़ताली चौक से बुझी हुई आग समेट रहे थे लोग

सीली हुई माचिस की तीलियाँ
सूखने के इंतजार में थीं .

हौसला
गगन तुम जुड़े रहना
टूटना नहीं
तुम्हारे नीचे कई लोग यों ही
टूटे और बिखरे पड़े हैं
तुम्हारे टूटने से वे और टूटते और बिखरते हैं
उनके हौसले के लिये तुम न टूटना

धरती तुम फटना नहीं
सीली हुई रहना यों ही
जैसी हो तुम
तुम्हारे ऊपर कई लोग सोते हैं
जिन्हें घर नहीं
वे पहले से ही फटे लोग हैं
बस तुम्हारे न फटने से वे और न फटेंगे .

हवायें तुम बहती रहना यों ही
गर्म हो कर नहीं
क्योंकि कई लोग धूप में तपे हुए लोग हैं

पहाड़ तुम खड़े रहना यों ही
तुम्हारे खड़े होने से
कई पड़े लोगों को खड़े होने का हौसला मिलता है

नदियाँ , सागर - मन्द मन्द बहते रहना यों ही
कई जमे लोग बहना सीख जाते हैं
तुम्हें बहता देख कर .

प्रकृति
उनके हौसले के लिये
तुम बची रहना .

वे बचायेंगे तुम्हें

उनके जिम्मे है धरती
वे संरक्षक हैं
और तत्पर हैं
वे बचायेंगे - नदी - नाले , पहाड़
झरने
सागर
खेत - खलिहान .
चर - अचर
जीव - अजीव
समस्त नैसर्गिक विन्यास .
तुम्हारी अस्थियाँ
तुम्हारे जीवाश्म . तुम्हारे सपने
तुम्हारी आस्थायें .
सड़क पर तुम्हारे जलते पाँव को
बारिश की फुहारों से धोया जायेगा .

सिर मुँड़ा कर
पितरों का श्राद्ध कर
आते हुए आदमी के सिर पर ओले पड़ने के पहले ही
किसी महा-पुरुष के नाम की आवास - योजना की छत
रख दी जायेगी उसके सिर .
तुम डर रहे थे हर पल
सियारों से लकड़बग्घों से बचपन से ही
जब तुम सोते थे
खेतों के बीच मचान पर .

तुम्हें रात के निविड़ अंधेरे में
डर लगता था
सन्नाटे की भयावह आवाजों से
उन्हें चीरते सियारों की क्रन्दन से .

उन्हें उन आवाजों से
अनजाने भय से
निर्भय रखना था तुम्हें .

अभय का तानना था वितान
कदीम क्रूर सपनों से
घात - विघातों से बचाना था तुम्हें .

वे समस्त पारितंत्र के विज्ञान का
कर रहे थे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से
पड़ताल
तुम्हारी हिफाजत उनकी प्राथमिकता थी .
तुम्हारी पेट की अँतड़ियाँ
भरी रहें
वे कर रहे थे
नित नये अनुसंधान .

प्रयोगशालाओं में
उगाये जा रहे थे
नित नये धान .

जब तुम कर रहे थे अनुलोम - विलोम
खुल रहे थे सुपरस्पेशल्टी अस्पताल .

तुम्हें बाघ , चीतों , सियार , हुँड़ार से
डर लगता था
वे बाघ और बकरी के लिये
बना रहे थे घाट .

वे साँप और चूहों को
बन्द रखना चाहते थे
एक शीशे के घर में .

उनके संरक्षण की योजनाओं के
तैयार थे रोड - मैप .
उनके जिम्मे है धरती
वे संरक्षक हैं
वे तत्पर हैं
वे क्रियाशील हैं
उनके पास योजनाये हैं
तुम्हें बचाये रखने की
वे बचायेंगे तुम्हें .

खुद की तस्वीर बनाती हुई स्त्री
 
स्त्री खुद की तस्वीर बना रही थी
सामने बड़ा कैनवास बिखेरे
हाथ में सलीके से कूची संभाले
डिबियों में कई रंग घोले

स्त्री सख्त जमीन उकेर रही थी
अपने पाँव के नीचे
स्त्री अपनी त्वचा खुरदुरी बना रही थी
बाहों में मछलियाँ

स्त्री अपनी देह बना रही थी
कठोर देहयष्टि

एक सुन्दर घर भी
पेड़- पंछी भी थे चित्र में
पहाड़ भी
कलकल करते झरने
सागर और नदियाँ भी

चित्र में एक बड़ा हस्ताक्षर भी बनाया स्त्री ने
और उकेरा एक बड़ा सा ' '

नहीं बनाया स्त्री ने
तो एक ईश्वर
ईश्वर गायब था उसके बनाये
खुद के चित्र से.

लोहे को जब गलते देखा

कच्चा लोहा खौलते देखा
साँचे में उसे ढलते देखा

लोहे को आकार में देखा
सरिया बनते देखा
सीमेन्ट कंकड़ संग मिलते देखा

मिट्टी से निकलते देखा
मिट्टी में खड़े होते देखा
मिट्टी में ही गलते देखा

हमने देखा
तुमने देखा
लोहे को भी गलते देखा.

जूते : दस कविताएँ

जूते - 1

दुकानों में सजे जूते आकर्षक लगते हैं
पैरों को ललचाते हैं वे .
पैरों में आते ही अचानक हो जाते हैं पुराने वे
तब उन्हें चमकाये रखने की जिम्मेवारी हो जाती है हाथों की .

जूते - 2

जूते मेरे पैरों ही नहीं मेरे चेहरे की भी शान हैं
जब वे चमकते हैं
मेरा चेहरा भी दमक रहा होता है शान से .

जूते - 3

जूते किसने बनाये आदमी या मशीन ने
नहीं जानता मैं . मैं तो देखता हूँ बस
एक जोड़ी हाथों को उनकी मरम्मत करते
बड़े प्यार से .

जूते - 4

नये जूते पैरों को काटते हैं
क्या मित्रता पुरानी हो कर मुलायम होती है
जूतों की तरह .

जूते -5

किसी की देह की चमड़ी
किसी के पैरों की चमड़ी के लिये
कितनी उपयोगी !

जूते - 6

जब भी मेरे जूतों में पड़ती हैं झुर्रियाँ
मैं आईने के सामने आ कर उन्हें तलाशता हूँ
अपने चेहरे में भी .

जूते - 7

सभ्य समाज में चमकौए
जूतों की बहुत अहमियत होती है
सराहे जाते हैं वे .
सभ्य समाज में किसी की शान में बट्टा लगाने के लिये
उछाले जाते हैं वे . जूतम-पैजार में
बेजार होते हैं जूते भी
तार-तार होते हैं वे ही .

जूते - 8

भीड़ में जूते जब कुचलते हैं
किसी के नंगे पाँव . तुम्हें पता है
तुम्हें पता भी नहीं होता
रोते हैं वे .

जूते -9

हजार मील की यात्रा शुरु होती है
उठाये गये एक कदम से .
हजार मील की की गयी यात्रा के सच्चे गवाह होते हैं जूते
आखिरी कदम तक .

जूते - 10

जूते बदहाल होने तक
मुझे शर्मसार नहीं होने देते .
वे मुस्कराते हैं तब तक
और मेरे फटे मोजों के इकलौते राजदार होते हैं ताउम्र.




2 टिप्‍पणियां:

आशीष मिश्र ने कहा…

जूते शीर्षक कविताएं अच्छी लगीं !

R K Das ने कहा…

शुक्रिया आशीष