सोमवार, 4 मई 2009

खाना बनाना भारत में एक कला है (क्रमशः)

[तो अरुणा जी ने कहा, माफ़ नहीं करेंगे। हमने कहा यह भी खूब हुआ - सज़ा तो मिलेगी। आसान नहीं है कुछ भी पा लेना चाहे सज़ा या इनाम। धन्यवाद अरुणा जी , माफ़ न करने के लिए। बन्धु श्री अनिल ने कुछ बाउंसर पकड़े । किंतु माफ़ करें, मैंने ...... खैर छोड़िए! सभी उतने खतरनाक थोड़े ही होते हैं कि माफ़ ही न करे]

तो मैं बात कर रहा था कि भारत में खाना बनाना कला है तो खाना खाना उत्सव ।
आपने भारतीय गृहणियों को देखा है कभी गौर से । कभी उनके चेहरे का वह संतोष देखा जो उनके चेहरे पर दूसरे को खाना खिलते समय झलकता है । नहीं, नहीं , इस बात को महत्त्व देंगे तब तो खाना बनाना एक तपस्या जैसी स्थिति हो जाएगी। वैसे भी भारतीय पुरूष को जीवन भर संतुष्ट रखना एक बेचारी सुकुमारी नारी के लिए तपस्या से कोई कम थोड़े ही है। मैं फिर बहक गया न ! रस्ते में इतना सुंदर बगीचा दिख जाएगा तो कौन नहीं भटकेगा - सिर्फ़ वही नही जो देखने में अक्षम है।
मैं हर उस की चित्र बना लेना चाहता हूँ जो मुझे भाता है- लेकिन नहीं बना सकता । पता क्यों ? क्योंकि चित्र बनाना जनता ही नही।
आइए मुद्दे पर आते है ।
आप याद करें कि खाने की कितनी चीजों का नाम ध्यान में है ?
आप कितने विलक्षण मस्तिष्क वाले होंगे बहुत सारे आयटम का नाम सुना ही नही होगा । ये सारी बात मैं उनसे नहीं कर रहा जो किताबें पढ़कर खाना बना कर सास को खुश करने का षड़यंत्र करती हैं। अब तो दोपहर का खाना , खास कर शहर के उन्नत परिवारों में, उस रेस्टोरेंट से आता है तो रात के डिन्नर के ख़ुद ही वहां चले जाते है। खाना बनाना पिछडापन माना जाता है , मैं उन लोगो से कत्तई मखातिब नहीं हूँ। माफ़ करें या न भी करेंगे तो चलेगा- गालियाँ भी चलेंगी।
इतिहास के पन्नों में आप आराम से पढ़ सकते है , संस्कृत के ग्रंथों में खोज सकते हैं खाना बनाना एक कौशल था।
याद है कि भीम, हाँ,हाँ, वही पांडवों में नंबर दो -पाककला में बड़े ही प्रवीण थे।
मैं एक गाँव में पला बढ़ा हूँ इसलिए जानता हूँ -
शादी विवाह के मौके पर बहुत सारे ऐसे पकवान मेहमान यानि समधी को परोसा जाता है जो सिर्फ़ तभी दीखता है या कहना चाहिए दीखता था। दादी माँ अब मर चुकी है -कभी कभी टीवी सीरियल में जो दादी या बा दिखती है वो नकली होती है। अब कोई मेरी दादी जैसी दादी कहाँ है जो भारतीय खाना बनाने की कलात्मक संस्कृति को बचा-बचा कर गाँठ बाँध कर रखे।
तो भी आप भारत की आत्मा गाँव में जाकर इस कलात्मकता को जी सकते है- जो व्यावसायिकता से अभी भी अछूते है - इसलिए पवित्र भी है।
अन्नपूर्णा उसी कला की देवी का नाम है।
बुफे सिस्टम और अपने हाथों से परोस कर खिलाने में जो फर्क है - वही फर्क खाना बनाने को व्यवसाय और कला कहने में है।
[आज मैं माफ़ी नही मांग रहा, खुल कर और जी भर सज़ा के लिए हाज़िर हूँ। ]

11 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

धन्यवाद आपकी टिपण्णी के लिए!
आपने बहुत खूब लिखा है खाना बनाना एक कला है ! बहुत ही शानदार! मैं खाना बनाने और खाना खाने दोनों की बहुत शौकीन हूँ इसलिए मुझे जादा अच्छा लगा परके! बहुत खूब लिखा है आपने! मेरे खाना मसाला ब्लॉग पर आपका स्वागत है!
http://khanamasala.blogspot.com

रवीन्द्र दास ने कहा…

shukriya aap aaye Babli!
khana padh kar bahut bhookh lagti hai mujhe. vaise bhi main bhojan-premi hun hi.

ARUNA ने कहा…

ये हुई न बात रविन्द्र जी! चलो काम को पूरा तो किया आपने! अछा लगा खाने के बारे में ढेर सारी बातें सुनके!
मुझे दूसरों के लिए खाना बनाने में बहुत मज़ा आता है, उससे भी ज्यादा मज़ा तब आता है जब लोग खुश होते हैं खाना खाके और मेरे खाने की वाहवाही करते हैं! है न मजेदार!

रवीन्द्र दास ने कहा…

dhay huaa Arunaji. main kuchh kuchh dara huaa tha.

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

खाना बनाना एक कला वास्‍तव में है।

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SBAI TSALIIM

शोभना चौरे ने कहा…

आप की मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी के लिए धन्यवाद .
अपने सच ही कहा हम सबकी ददीया अंनपूर्णाही
और ये सबकॉ विरासत मे मिलता है ये अल्ग बात है की कओन उसका कैसे उपयोग करता है |

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत शानदार.खाना बनाना निश्चित रूप से एक कला है, और मानना होगा कि हर कला का अब व्यावसायिकरण हो गया है,ऐसे में इसे एक खूबसूरत स्वादिष्ट व्यवसाय कहने में क्या हर्ज़ है?

ज्योति सिंह ने कहा…

सुन्दर आलेख...मेरे ब्लौग पर आप आये, इसके लिए आभारी हूँ.

रवीन्द्र दास ने कहा…

mahamantri(?)ji, shobhnaji,vandnaji aur jyotiji,
aap sab ka hardik dhanyvad.

Harkirat Haqeer ने कहा…

चलिते आपने इस तपस्या को पहचाना तो.....!!

रवीन्द्र दास ने कहा…

kya bat kar di aapne Harkeerat ji, ham itne bhi namurad nahin.
aap aaye aur saraha, iske liye shukriya!