[तो अरुणा जी ने कहा, माफ़ नहीं करेंगे। हमने कहा यह भी खूब हुआ - सज़ा तो मिलेगी। आसान नहीं है कुछ भी पा लेना चाहे सज़ा या इनाम। धन्यवाद अरुणा जी , माफ़ न करने के लिए। बन्धु श्री अनिल ने कुछ बाउंसर पकड़े । किंतु माफ़ करें, मैंने ...... खैर छोड़िए! सभी उतने खतरनाक थोड़े ही होते हैं कि माफ़ ही न करे]
तो मैं बात कर रहा था कि भारत में खाना बनाना कला है तो खाना खाना उत्सव ।
आपने भारतीय गृहणियों को देखा है कभी गौर से । कभी उनके चेहरे का वह संतोष देखा जो उनके चेहरे पर दूसरे को खाना खिलते समय झलकता है । नहीं, नहीं , इस बात को महत्त्व देंगे तब तो खाना बनाना एक तपस्या जैसी स्थिति हो जाएगी। वैसे भी भारतीय पुरूष को जीवन भर संतुष्ट रखना एक बेचारी सुकुमारी नारी के लिए तपस्या से कोई कम थोड़े ही है। मैं फिर बहक गया न ! रस्ते में इतना सुंदर बगीचा दिख जाएगा तो कौन नहीं भटकेगा - सिर्फ़ वही नही जो देखने में अक्षम है।
मैं हर उस की चित्र बना लेना चाहता हूँ जो मुझे भाता है- लेकिन नहीं बना सकता । पता क्यों ? क्योंकि चित्र बनाना जनता ही नही।
आइए मुद्दे पर आते है ।
आप याद करें कि खाने की कितनी चीजों का नाम ध्यान में है ?
आप कितने विलक्षण मस्तिष्क वाले होंगे बहुत सारे आयटम का नाम सुना ही नही होगा । ये सारी बात मैं उनसे नहीं कर रहा जो किताबें पढ़कर खाना बना कर सास को खुश करने का षड़यंत्र करती हैं। अब तो दोपहर का खाना , खास कर शहर के उन्नत परिवारों में, उस रेस्टोरेंट से आता है तो रात के डिन्नर के ख़ुद ही वहां चले जाते है। खाना बनाना पिछडापन माना जाता है , मैं उन लोगो से कत्तई मखातिब नहीं हूँ। माफ़ करें या न भी करेंगे तो चलेगा- गालियाँ भी चलेंगी।
इतिहास के पन्नों में आप आराम से पढ़ सकते है , संस्कृत के ग्रंथों में खोज सकते हैं खाना बनाना एक कौशल था।
याद है कि भीम, हाँ,हाँ, वही पांडवों में नंबर दो -पाककला में बड़े ही प्रवीण थे।
मैं एक गाँव में पला बढ़ा हूँ इसलिए जानता हूँ -
शादी विवाह के मौके पर बहुत सारे ऐसे पकवान मेहमान यानि समधी को परोसा जाता है जो सिर्फ़ तभी दीखता है या कहना चाहिए दीखता था। दादी माँ अब मर चुकी है -कभी कभी टीवी सीरियल में जो दादी या बा दिखती है वो नकली होती है। अब कोई मेरी दादी जैसी दादी कहाँ है जो भारतीय खाना बनाने की कलात्मक संस्कृति को बचा-बचा कर गाँठ बाँध कर रखे।
तो भी आप भारत की आत्मा गाँव में जाकर इस कलात्मकता को जी सकते है- जो व्यावसायिकता से अभी भी अछूते है - इसलिए पवित्र भी है।
अन्नपूर्णा उसी कला की देवी का नाम है।
बुफे सिस्टम और अपने हाथों से परोस कर खिलाने में जो फर्क है - वही फर्क खाना बनाने को व्यवसाय और कला कहने में है।
[आज मैं माफ़ी नही मांग रहा, खुल कर और जी भर सज़ा के लिए हाज़िर हूँ। ]
सोमवार, 4 मई 2009
शनिवार, 2 मई 2009
भारत में खाना बनाना एक कला है
आज के विश्व में भारत की कोई बड़ी ऊँची साख नहीं है। अगर ऐसा होता तो दुसरे देशों में जाकर लोग ग्रीन कार्ड के चक्कर में न पड़ते। कोई न कोई तो कमी होगी ही तभी तो भाई लोग पहले तो फोरेन जाने के लिए जी तोड़ कोशिश करते है बाद में वहां से इंडिया को मिस करते है। हाय रे दैव!
आज के समय की एक और खासियत है और वह है कला का व्यवसायीकरण।
लोगबाग कला का व्यापर कर रहे हैं लेकिन उम्मीद कटे हैं कि उन्हें सम्मान भी मिले !
ये कैसे होगा ?
अख़बारों में छपता है कि अमुक नचनिया का रेट अब एक करोड़ हो गया और उस नाचनेवाले का सम्मान बढ़ जाता है। क्यों?
इसका जवाब किसी के पास न होगा क्योंकि खैरख्वाही लेने वालो का व्याकरण कुछ अलग होता है।
न जाने , मैं भी क्या बकबक करने लगा ?
बात थी खाने की और मै देखने चला गया नाच और तमाशा।
तो मैं बात कर रहा था खाना बनाना भारत में एक कला है ।
हो सकता है कि आप ने कभी भारत का गाँव देखा हो।
वहां हर कम कराती हुई स्त्रियाँ गाना गाती है -धन कूटती हुई , गेहूं पिसती हुई, ............... कर रही होती है मेहनत और मना रही होती है उत्सव ।
विद्वान् लोग और प्रोफेशनल लोग कह सकते है- उत्सवधर्मिता पिछडापन और गरीबी की निशानी है ।
माफ़ कीजिए ,
खाना बनाना सचमुच एक कला है । कैसे? यह भी मैं जरुर बताऊंगा लेकिन कभी और ।
आज और अभी के लिए मुझे माफ़ किया इसके लिए धन्यवाद।
आज के समय की एक और खासियत है और वह है कला का व्यवसायीकरण।
लोगबाग कला का व्यापर कर रहे हैं लेकिन उम्मीद कटे हैं कि उन्हें सम्मान भी मिले !
ये कैसे होगा ?
अख़बारों में छपता है कि अमुक नचनिया का रेट अब एक करोड़ हो गया और उस नाचनेवाले का सम्मान बढ़ जाता है। क्यों?
इसका जवाब किसी के पास न होगा क्योंकि खैरख्वाही लेने वालो का व्याकरण कुछ अलग होता है।
न जाने , मैं भी क्या बकबक करने लगा ?
बात थी खाने की और मै देखने चला गया नाच और तमाशा।
तो मैं बात कर रहा था खाना बनाना भारत में एक कला है ।
हो सकता है कि आप ने कभी भारत का गाँव देखा हो।
वहां हर कम कराती हुई स्त्रियाँ गाना गाती है -धन कूटती हुई , गेहूं पिसती हुई, ............... कर रही होती है मेहनत और मना रही होती है उत्सव ।
विद्वान् लोग और प्रोफेशनल लोग कह सकते है- उत्सवधर्मिता पिछडापन और गरीबी की निशानी है ।
माफ़ कीजिए ,
खाना बनाना सचमुच एक कला है । कैसे? यह भी मैं जरुर बताऊंगा लेकिन कभी और ।
आज और अभी के लिए मुझे माफ़ किया इसके लिए धन्यवाद।
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009
आकृति भाटिया के हत्यारे!
स्कूल ने आकृति भाटिया को मरने दिया।
अब, स्कूल को, प्रशासन को, प्रशासक को आप क्या सज़ा मुक़र्रर करते हैं?
क्या स्कूल में पढने भेजे बच्चे के स्वास्थ्य आदि की जिम्मेदारी (निगरानी ) क्या माँ-बाप रख सकते हैं?
उन स्कूलों को , जिनकी मासिक वसूली करोड़ों की है, वे बच्चों की सुरक्षा, उनके कल्याण बगैरह की कितनी चिंता रहती है?
आपके बच्चे भी इस तरह के स्कूलों में जाते होंगे, विचार कीजिए ।
तय है कि स्कूल के मालिकानों का हाथ लंबा और तगड़ा होगा -
नेता, जज , पुलिस और समाजसेवी-संस्थाएं सभी उनकी जेब में पड़े होंगे !
उनका कुछ नहीं बिगडेगा -
फिर आप और मै इस तरह के लोगों-स्वार्थी और नीच लोगों को निंदा के नमक से गला डालेंगे।
आइए हम सब मिलकर अपील करें-
आकृति के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले
अब, स्कूल को, प्रशासन को, प्रशासक को आप क्या सज़ा मुक़र्रर करते हैं?
क्या स्कूल में पढने भेजे बच्चे के स्वास्थ्य आदि की जिम्मेदारी (निगरानी ) क्या माँ-बाप रख सकते हैं?
उन स्कूलों को , जिनकी मासिक वसूली करोड़ों की है, वे बच्चों की सुरक्षा, उनके कल्याण बगैरह की कितनी चिंता रहती है?
आपके बच्चे भी इस तरह के स्कूलों में जाते होंगे, विचार कीजिए ।
तय है कि स्कूल के मालिकानों का हाथ लंबा और तगड़ा होगा -
नेता, जज , पुलिस और समाजसेवी-संस्थाएं सभी उनकी जेब में पड़े होंगे !
उनका कुछ नहीं बिगडेगा -
फिर आप और मै इस तरह के लोगों-स्वार्थी और नीच लोगों को निंदा के नमक से गला डालेंगे।
आइए हम सब मिलकर अपील करें-
आकृति के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले
सोमवार, 20 अप्रैल 2009
तंत्र: स्त्रीतंत्र बनाम पुरूषतंत्र -2
तो फिर, सबको पता ही होगा कि तंत्र एक साधना है।
साधना का तात्पर्य साधक की सिद्धि में होता है। इस तंत्र- साधना में पुरूष साधक पञ्च मकार से साधना करता है। पञ्च-मकार यानि मन्त्र, मुद्रा , मत्स्य , मांस और मैथुन । पहला चार मकार सामाजिक दृष्टि से आलोचनीय नहीं है अत एव उस पर विचार के लिए तंत्र वादियों को आमंत्रित किया जाय। हमारा आलोचन तो सिर्फ़ मैथुन पर होगा क्योंकि इसमे आधा और आधा विश्व अर्थात पुरी दुनिया समाहित है। दुसरे शब्दों में, स्त्री और पुरूष। पुरूष साधक और स्त्री साधना का उपकरण । समकालीन सन्दर्भ में इसे समझने के लिए आप फैशन की दुनिया को देख सकते है जहाँ दिखती तो है स्त्री लेकिन हिट होता है कोई पुरूष (कोई स्त्री होती भी है तो उसे शक्ति स्वरूप पुरूष का छद्म रूप समझ सकते हैं।)
जारी...............
साधना का तात्पर्य साधक की सिद्धि में होता है। इस तंत्र- साधना में पुरूष साधक पञ्च मकार से साधना करता है। पञ्च-मकार यानि मन्त्र, मुद्रा , मत्स्य , मांस और मैथुन । पहला चार मकार सामाजिक दृष्टि से आलोचनीय नहीं है अत एव उस पर विचार के लिए तंत्र वादियों को आमंत्रित किया जाय। हमारा आलोचन तो सिर्फ़ मैथुन पर होगा क्योंकि इसमे आधा और आधा विश्व अर्थात पुरी दुनिया समाहित है। दुसरे शब्दों में, स्त्री और पुरूष। पुरूष साधक और स्त्री साधना का उपकरण । समकालीन सन्दर्भ में इसे समझने के लिए आप फैशन की दुनिया को देख सकते है जहाँ दिखती तो है स्त्री लेकिन हिट होता है कोई पुरूष (कोई स्त्री होती भी है तो उसे शक्ति स्वरूप पुरूष का छद्म रूप समझ सकते हैं।)
जारी...............
बुधवार, 15 अप्रैल 2009
तंत्र: स्त्रीतंत्र बनाम पुरूषतंत्र-1
भारत की सभ्यता और संस्कृति अत्यन्त प्राचीन है। इतनी पुरानी कि इतिहासकार आपस में मतभेद करते रहते हैं। पुरानी चीजों,पुरानी बातों के विषय में तरह तरह की कहानियाँ-किम्बदंतियाँ मशहूर हो जाया करती है। सो भारतीय संस्कृति के बारे में भी बहुत कुछ मशहूर है। इनमे कुछ रोचक हैं, कुछ आकर्षक तो कुछ मन को खट्टा कर देने वाला। जो जिस तरह का पथ बनाना चाहता है- इन धुंधलाए इतिहास के पन्नों से बना लेते है। बेचारा इतिहास है ही इतिहासकारों के इशारों पर नाचने वाला ज़र-खरीद गुलाम।
(बातें जारी हैं )
(बातें जारी हैं )
सोमवार, 13 अप्रैल 2009
शर्म कैसे आती है
मुझे अभी के अभी बता दो- शर्म कैसे आती है?
शादी करके जैसे दुल्हन ससुराल आती है
या जैसे कोई ट्रांसफर होकर नए दफ्तर में आता है
या जैसे नींद आती है यो जैसे हँसी या रोना आता है !
बताओ न !
बताते क्यों नहीं ?
मुझे भी देखना है कि शर्म कैसे आती है?
क्या वह हवाई जहाज पर उड़ कर आती है!
शर्म देखने कैसी है?
सोनल बुआ की तरह या मिनल भाभी की तरह या प्रियंका मौसी की तरह।
हाँ, वैसी ही होगी शर्म भी
कितनी बातूनी है न सोनल बुआ , पर प्रियंका मौसी अच्छी हैं ।
अच्छा मम्मी ,
शर्म का आना लोगों को क्यों अच्छा नहीं लगता !
मुझे तो कोई कुछ बताता ही नहीं ।
अच्छा मम्मी,
दादाजी और दादीमाँ उसदिन बात कर रहे थे कि अब किसी को शर्म नहीं आती।
क्यों नहीं आती है शर्म , मम्मी!
मैं लेके आऊंगा शर्म को
पर कोई मुझे बताओ तो सही कि शर्म आती कैसे है ?
शादी करके जैसे दुल्हन ससुराल आती है
या जैसे कोई ट्रांसफर होकर नए दफ्तर में आता है
या जैसे नींद आती है यो जैसे हँसी या रोना आता है !
बताओ न !
बताते क्यों नहीं ?
मुझे भी देखना है कि शर्म कैसे आती है?
क्या वह हवाई जहाज पर उड़ कर आती है!
शर्म देखने कैसी है?
सोनल बुआ की तरह या मिनल भाभी की तरह या प्रियंका मौसी की तरह।
हाँ, वैसी ही होगी शर्म भी
कितनी बातूनी है न सोनल बुआ , पर प्रियंका मौसी अच्छी हैं ।
अच्छा मम्मी ,
शर्म का आना लोगों को क्यों अच्छा नहीं लगता !
मुझे तो कोई कुछ बताता ही नहीं ।
अच्छा मम्मी,
दादाजी और दादीमाँ उसदिन बात कर रहे थे कि अब किसी को शर्म नहीं आती।
क्यों नहीं आती है शर्म , मम्मी!
मैं लेके आऊंगा शर्म को
पर कोई मुझे बताओ तो सही कि शर्म आती कैसे है ?
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009
बाबा मटुकनाथ की प्रेम-पार्टी
बुजुर्गों ने कहा है - कुकर्मी का नाम या सुकर्मी का नाम।
तो मित्रो,
डॉ मटुकनाथ ने जैसे-तैसे नाम तो अर्जित कर ही लिया है। कैसे?
भई, जब मैं और आप उस व्यक्ति को जानते हैं- चाहे जिन कारणों से- यही तो प्रसिद्धि है। बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ? हुआ, सौ बार हुआ।
नाम हुआ था प्रेम के कारण-यह भी सनद रहे।
किसी ने मुंह पर कालिख पोत दी - श्रीमानजी धीर-गंभीर स्थित-प्रज्ञ की तरह अविचलित रहे थे, याद आया। कुछ लोगों को इसमे सहिष्णुता दिखी होगी तो कुछ लोगों को अहिंसा। पर मुझ जैसे चंद नासमझों को उसकी लाचारी और बेबसी दिखी, बस नज़र-नज़र का फेर है और क्या!
तो सुना कि भाईसाहेब, एक प्रेम-आधारित राजनैतिक पार्टी का गठन किया है पटना में।
डॉ साहिब प्रेम पर बल देना चाहते हैं। दुसरे शब्दों में , प्रेम पर आधारित समाज का निर्माण करना चाहते है। जो भी अपनी बसी बसाई गृहस्थी को उजाड़ कर अपनी बेटी आदि की उम्र की स्त्रियों से प्रेम करना चाहते हों,( क्षमा करें, बात सिर्फ़ पुरुषों को ध्यान में रखकर हो रही है, इसी तरह महिलाऐं भी अपना स्थान निर्धारित कर ले सकती हैं ) यह प्रेम पार्टी उनकी सामाजिक निंदा से रक्षा करते हुए , सुरक्षा की पूरी व्यवस्था करेगी।
तय है कि हम आप में से बहुत सारे लोग इस कुंठा के मारे बेचारे होंगे तो अब देर किस बात की चुपचाप बाबा मटुकनाथ की प्रेम पार्टी को अपना गुप्त समर्थन भेजें।
मैं व्यक्तिगत रूपसे परिवारवादी हूँ - ऐसे किसी कृत्यों की जोरदार शब्दों में भर्त्सना करता हूँ और लानत भेजता हूँ कि ऐसे लोग किसी भी व्यवस्थामूलक समाज के शरीर पर फोड़ा है जो कभी कभी ज्यादा आम या मिठाई खाने से हो जाता है ।
ऐसे लोग टेपचू होते है सिर्फ़ निंदा अपमान से नष्ट नहीं होते है।
और हम लोगों को इनका तमाशा देखने में मजा आता है।
तो आइये , इस टेपचू व्यक्तित्व वाले मटुकनाथ की प्रेम पार्टी का तमाशा देखें कि कितने स्वच्छंदता के पक्षपाती इस महत-उद्देश्य में अपना अमूल्य योगदान देते हैं।
तो मित्रो,
डॉ मटुकनाथ ने जैसे-तैसे नाम तो अर्जित कर ही लिया है। कैसे?
भई, जब मैं और आप उस व्यक्ति को जानते हैं- चाहे जिन कारणों से- यही तो प्रसिद्धि है। बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ? हुआ, सौ बार हुआ।
नाम हुआ था प्रेम के कारण-यह भी सनद रहे।
किसी ने मुंह पर कालिख पोत दी - श्रीमानजी धीर-गंभीर स्थित-प्रज्ञ की तरह अविचलित रहे थे, याद आया। कुछ लोगों को इसमे सहिष्णुता दिखी होगी तो कुछ लोगों को अहिंसा। पर मुझ जैसे चंद नासमझों को उसकी लाचारी और बेबसी दिखी, बस नज़र-नज़र का फेर है और क्या!
तो सुना कि भाईसाहेब, एक प्रेम-आधारित राजनैतिक पार्टी का गठन किया है पटना में।
डॉ साहिब प्रेम पर बल देना चाहते हैं। दुसरे शब्दों में , प्रेम पर आधारित समाज का निर्माण करना चाहते है। जो भी अपनी बसी बसाई गृहस्थी को उजाड़ कर अपनी बेटी आदि की उम्र की स्त्रियों से प्रेम करना चाहते हों,( क्षमा करें, बात सिर्फ़ पुरुषों को ध्यान में रखकर हो रही है, इसी तरह महिलाऐं भी अपना स्थान निर्धारित कर ले सकती हैं ) यह प्रेम पार्टी उनकी सामाजिक निंदा से रक्षा करते हुए , सुरक्षा की पूरी व्यवस्था करेगी।
तय है कि हम आप में से बहुत सारे लोग इस कुंठा के मारे बेचारे होंगे तो अब देर किस बात की चुपचाप बाबा मटुकनाथ की प्रेम पार्टी को अपना गुप्त समर्थन भेजें।
मैं व्यक्तिगत रूपसे परिवारवादी हूँ - ऐसे किसी कृत्यों की जोरदार शब्दों में भर्त्सना करता हूँ और लानत भेजता हूँ कि ऐसे लोग किसी भी व्यवस्थामूलक समाज के शरीर पर फोड़ा है जो कभी कभी ज्यादा आम या मिठाई खाने से हो जाता है ।
ऐसे लोग टेपचू होते है सिर्फ़ निंदा अपमान से नष्ट नहीं होते है।
और हम लोगों को इनका तमाशा देखने में मजा आता है।
तो आइये , इस टेपचू व्यक्तित्व वाले मटुकनाथ की प्रेम पार्टी का तमाशा देखें कि कितने स्वच्छंदता के पक्षपाती इस महत-उद्देश्य में अपना अमूल्य योगदान देते हैं।
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