शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

माँ ! मुझे तुम याद क्यों न आती

माँ!...............
तुम मुझे याद क्यों न आती हो, माँ!
मैं इतना क्यों उलझ गया हूँ समय से
कि तुम्हारी ममता का सच कहीं खो गया मुझसे
कभी जब चल पड़ा था तरक्की के रास्ते
तुम्हारे मना करने के बावजूद
मना कर दिया था अतीत को ढोने से
माँ ! तुमने तो कहा था साफ-साफ
कि जाना है तो जाओ छोड़कर अपनी माँ को
मैं चल नहीं पाऊँगी तेरे साथ
मैं अपनी जन्म भूमि को छोड़कर
कोसता हुआ तुम्हे
तुम्हारी दकियानूसी सोच को
चल पड़ा था अरमानों की गठरी दबाए
रुक नहीं पाया हूँ आज तक
और न जाने
कितनी देर और कितनी दूर तक चलता जाऊंगा माँ!
माँ !
मुझे पुकारो मेरे स्नेहिल नाम से
चाहे तुम जहाँ भी हो
मुझे मिल जाएगा आइना
मेरी अपनी आँखों में भी समा जाएगी खुद की पहचान
माँ......
एक बार
बस एक बार याद आओ माँ
मैं तुम्हे कैसे भूल गया
माँ.... माँ......माँ .....
मैं तुम्हे कैसे याद करूँ
बताओ न माँ !

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