मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मैं और मेरी पहचान

मेरी पहचान मेरी संस्कृति से होती है ?
या मेरी संस्कृति की पहचान मुझसे होती है ?

ये दो छोटे-छोटे मौलिक प्रश्न मुझे बेहद परेशान करते हैं। मैं जब स्वयं को पहचानने का यत्न करता हूँ तो मुझे कुछ आध्यात्मिक यानि कुछ अन्दर की यात्रा करनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में, मुझे अपनी चेतना का मुआयना करना पड़ता है। यहाँ दिक्कत यह आती है कि उसी चेतना से उसी चेतना को देखना पड़ता है। यानि दृश्य और द्रष्टा एक। यह कैसे होगा! कुछ दिक्कत है।

दूसरा विकल्प है कि मैं कहूँ कि मैं अपनी चेतना से संचालित कार्यों का मुआयना अपनी चेतना द्वारा करता हूँ। स्वयं को पाने का स्थान है - अपने चेतन कार्य। आप स्वयं को जानना चाहते हैं तो अपने चेतन कार्य में स्वयं को खोजें। चेतन कार्य यानि वे कार्य जिनमे आपका संकल्प बिना किसी दबाव के शामिल है। अस्तु!
आप या कोई मुझसे पूछे कि मैं कौन हूँ । तो मुझे क्या उत्तर देना चाहिए ?

मैं बहुधा इस प्रश्न के उत्तर में
कभी अपना नाम बताता हूँ
कभी अपना पेशा बताता हूँ
कभी घर का पता तो कभी उस आदमी का नाम जिसने मुझे भेजा होता है,
इस तरह से मेरा काम चल निकलता है, कुछ ऐसे जैसे सामने वाले व्यक्ति को मेरे बारे में पूरी जानकारी मिल गई हो।
अभी -आजकल बायोडाटा का जमाना है । हम ख़ुद को एक या एक से अधिक पृष्ठ का बायो-डाटा के माध्यम से दूसरे को जनाते है ।
किंतु मुझे वे लोग बड़े क्रेजी और होशियार मालूम होते है जो प्यार करते है और एक दूसरे को आंखों - आंखों में ही जान लेते है।

अंत में , मुझे लगता है कि मेरा परिचय अथवा मेरी पहचान दूसरो की जरूरत और मर्जी पर अधिक निर्भर है । हालाँकि हम इसे बदलने की पूरी कोशिश करते है और थोड़े बहुत सफल भी होते हैं।

5 टिप्‍पणियां:

भास्कर रौशन ने कहा…

सामान्य प्रचलन कुछ भी हो लेकिन मस्ला बहुत संगीन है। क्यों ना अस्मिता की अवधारणा पर गहराई से सोचा जाए?

R K DAS ने कहा…

ofcourse, it is matter to identity,i.e, ASMITA.
yah ek dvandvatmak sawal hai. ham bahar aur bhitar se satat sangharsh karte hi rahte hain aur ant me koi pahchan odhkar kam chalate hain.

sandhyagupta ने कहा…

..मुझे लगता है कि मेरा परिचय अथवा मेरी पहचान दूसरो की जरूरत और मर्जी पर अधिक निर्भर है ।

Shayad sabke sath yahi sthiti hai.

raj ने कहा…

sahi kaha apne....hum apni pahchaan to bnana chahte hai....

हितेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा…

bahut barhia... isi tarah likhte rahiye

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mithilak gap maithili me

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