सोमवार, 30 मई 2011

जाति... जाति...

भारतीय समाज की एक अजीब सी विशेषता है जाति। इस जाति के कारण जाति-भेद है , जातिवाद है , जात-पांतहै। परंपरा से इस पर बहस होती आ रही है।
संस्कृति-विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग, जो पश्चिमी और आधुनिक इतिहास दृष्टि से अपने समय को आंकता हैं, जाति की धारणा का विरोध करता नज़र आता है। वे मानते है कि इस आधुनिक परिवेश और जीवन शैली में जाति का कोई महत्त्व नहीं होना चाहिए। जाति एक मध्य युगीन फेनोमेना है। जो जाति की बात करता है, वह पिछड़ा हुआ है अथवा समाज को बदहाली में ले जाने का षड्यंत्र कर रहा है।
बदकिस्मती से, उपर्युक्त विचार सिर्फ अपने आपको उच्च वर्ण में स्थान पाए लोगों का है।

गुरुवार, 26 मई 2011

अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य

अहम् ब्रह्मास्मि का सरल हिन्दी अनुवाद है कि मैं ब्रह्म हूँ सुनकर बहुधा लोग ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाया करते हैं। इसका कारण यह है लोग - जड़ बुद्धि व्याख्याकारों के कहे को अपनाते है। किसी भी अभिकथन के अभिप्राय को जानने के लिए आवश्यक है कि उसके पूर्वपक्ष को समझा जाय।
उपनिषद् अथवा इसके एक मात्र प्रमाणिक भाष्यकार आदिशंकराचार्य किसी व्यक्ति-मन में किसी भी तरह का अंध-विश्वास अथवा विभ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहते थे।
इस अभिकथन के दो स्पष्ट पूर्व-पक्ष हैं-
१) वह धारणा जो व्यक्ति को धर्म का आश्रित बनाती है। जैसे, एक मनुष्य क्या कर सकता है करने वाला तो कोई और ही है। मीमांसा दर्शन का कर्मकांड-वादी समझ , जिसके अनुसार फल देवता देते हैं, कर्मकांड की प्राविधि ही सब कुछ है । वह दर्शन व्यक्ति सत्ता को तुच्छ और गौण करता है- देवता, मन्त्र और धर्म को श्रेष्ठ बताता है। एक मानव - व्यक्ति के पास पराश्रित और हताश होने के आलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता। धर्म में पौरोहित्य के वर्चस्व तथा कर्मकांड की 'अर्थ-हीन' दुरुहता को यह अभिकथन चुनौती देता है।
२) सांख्य-दर्शन की धारणा है कि व्यक्ति (जीव) स्वयं कुछ भी नहीं करता, जो कुछ भी करती है -प्रकृति करती है। बंधन में भी पुरूष को प्रकृति डालती है तो मुक्त भी पुरूष को प्रकृति करती है। यानि पुरूष सिर्फ़ प्रकृति के इशारे पर नाचता है। इस विचारधारा के अनुसार तो मानव-व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व है ही नहीं।
इन दो मानव-व्यक्ति-सत्ता विरोधी धारणाओं का खंडन और निषेध करते हुए शंकराचार्य मानव-व्यक्तित्व की गरिमा की स्थापना करते हैं। आइये, समझे कि अहम् ब्रह्मास्मि का वास्तविक तात्पर्य क्या है?
अहम् = मैं , स्वयं का अभिमान , कोई व्यक्ति यह सोच ही नहीं सकता कि वह नहीं है। मैं नही हूँ - यह सोचने के लिए भी स्वयं के अभिमान की आवश्यकता होती है। या नहीं ? विचार करें ।
ब्रह्म= सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ , सर्व-व्याप्त , वह शक्ति जिससे सब कुछ, यहाँ तक कि ईश्वर भी उत्पन्न होते हैं।
अस्मि= हूँ, होने का भाव , बने होने का संकल्प ।
सबसे पहले तो सभी मनुष्य को यह दृढ़ता से महसूस करना चाहिए कि वह है । अपने को किसी दृष्टि से , किसी भी कारण से, किसी के भी कहने से अपने को हीन, तुच्छ, अकिंचन आदि कतई नहीं मानना चाहिए। यह एक तरह का आत्म-घात है, अपने अस्तित्व के प्रति द्रोह है। कोई यदि आपको यह विश्वास दिलाने का यत्न करे कि आप तुच्छ हैं तो आप उस बात को पागल को प्रलाप समझ कर नज़र-अंदाज़ कर जाएँ।
दूसरी बात यह कि आप में, यानि हर व्यक्ति में सबकुछ= कुछ भी कर सकने की शक्ति विद्यमान है। ब्रह्म कहे जाने का अभिप्राय यही है कि प्रत्येक व्यक्ति में संभावन एक-सा है । कोई वहां उस गद्दी पर बैठ कर जो आपको ईश्वर प्राप्ति का रास्ता बता रहा है, वह स्वयं दिग्भ्रमित है और आपको मुर्ख बनने का प्रयास कर रहा है। आप स्वयं सर्व-शक्तिमान ब्रह्म हैं, इस सत्य का आत्मानुभव बड़ा है। उपनिषद और शंकराचार्य हमें यही विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।
अंत में ,
अहम् ब्रह्मास्मि का तात्पर्य यह निगमित होता है कि मानव-व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसका व्यक्तित्व अत्यन्त महिमावान है - इसलिए हे मानवों !
अपने व्यक्तित्व को महत्त्व दो। आत्मनिर्भरता पर विश्वास करो। कोई ईश्वर, पंडित, मौलवी, पादरी और इस तरह के किसी व्यक्तियों को अनावश्यक महत्त्व न दो। तुम स्वयं शक्तिशाली हो -उठो, जागो और जो भी श्रेष्ठ प्रतीत हो रहा हो , उसे प्राप्त करने हेतु उद्यत हो जाओ ।
जो व्यक्ति अपने पर ही विश्वास नही करेगा-उससे दरिद्र और गरीब मनुष्य दूसरा कोई न होगा। यही है अहम् ब्रह्मास्मि का अन्यतम तात्पर्य।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

कविता पढना ... कविता लिखने से ज्यादा मुश्किल है !

कविता और कवि में फर्क होता है। यह बेसुरी बात मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अधिकांश लोग यह बात बिसरा चुके हैं। बल्कि बहुधा लोग यह मानते ही नहीं होंगे कि कविता का अपना वजूद होता है.... उसकी उपस्थिति का अपना एक अर्थ, एक उद्देश्य होता है। यह मान लिया जाता है कि अमुक कवि का एक स्टेटमेंट है... अटपटे गद्य में लिखा एक बयान है बस। ऐसा सिर्फ कविता पर 'वाह-वाह' करने वाले कर रहे होते तो बात कुछ और होती... कई कवियों से बात हुई... उनकी प्रति-प्रतिक्रिया देखी ..... तो अनुभव से बड़ा ही निराश हुआ... कवियों तक ने यह कह दिया ... अरे रवीन्द्र जी.... या दास भाई... जो मन में आया लिख दिया ... हम उतना नहीं सोचते। फिर भी उन्होंने कविता(?) लिख दी - यह बात काबिले-गौर है.....
जब इस तरह के मर्म-घातक अनुभव हुए तो कविता के प्रति सामाजिक रवैये में हुए क्षरण का कुछ-कुछ कारण समझ में आने लगा। कविता लिखने वालों से आप बात करके देखें.... तो पता चलेगा कि वो कविता पढ़ते नहीं... हाँ कुछ कवियों को पढ़ते हैं... और उनसे कविता पर बात करने की कोशिश कीजिये... तो सबसे पहले टालने की कोशिश करेंगे... बहुत जोर देने पर "कोई एक" चमकदार पंक्ति के आसपास कविता को फिक्स करने की या उसी पंक्ति में रिड्यूस करने की जुगत करते हैं।
कविता को किसी खास चमकदार पंक्ति में फिक्स करने या उसीमें रिड्यूस करने की चतुराई अनाड़ी ही नहीं ... होशियार आलोचक भी करते हैं... यह पाठ की प्राविधि सी बन गई है ... इस लिए जो फटाफट कवि हैं या जबरदस्ती के कवि हैं ... कविता के नाम पर कुछ अटपटा गद्य ... किन्तु बीच- बीच में एक - दो बहुप्रचलित सिद्धांतों के अनुकूल चमकदार पंक्ति डाल देते हैं... उनके अपने समीक्षक - आलोचक उसी भरोसे कविता को महान समयविद्ध रचना साबित कर देते हैं।
लेकिन कविता है तो कविता है... कभी आपने कहीं सुना- पढ़ा है कि किसी बेतरतीब और अटपटे गद्य को देखकर कविता-विशेषज्ञ ने कहा हो कि यह कविता नहीं है... इस का तात्पर्य यह है कि कविता लिखना बहुत सुगम है... और कविता पढना एक नासमझी .... लेकिन कुछ लोग कवि को पढ़ते हैं... वाह-वाह करते हैं... इसका आधार लिंग-क्षेत्र-जाति प्रभृत कुछ प्रिय कारण होते हैं।
दीगर बात है कि यह बात सब पर लागू नहीं होती ....

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

भाषा सुधार के रास्ते

"आपने उसे लिखने को कहा ?

जो न हमारी जाति का है , न धर्म का

पढ़ा है मैंने उसके लिखे को

न बातों का कोई सिलसिला है

न सिद्धांत का निर्णय निरपेक्ष..."

पांच साल की लंबी जुगत के बाद

जब बन पाया था संगठन में प्रवेश

नए सदस्य ने पहली करवाई कुछ ऐसे की.

यह अग्नि-परीक्षा की प्रथा है

चुगली नहीं ... प्रणाली है

पुराने सम्बन्ध के टूटने का प्रमाण

नया सम्बन्ध है.

हंस-पाद के जरिये अटक जाना

वाक्यों के बीच में

आसन्न पदों को विलगाकर

और हो जाना अपना .. दोनों का

जीवन में भाषा सुधार कार्य के माध्यम से

किसी झमेले में

या संगठन में घुसने का

आसान और सर्वथा-सिद्ध उपाय है...

रविवार, 10 अप्रैल 2011

गुमराह हो चला है हमारा समय

पिछले कई दिनों से अन्ना हजारे नामक एक बहुत शक्तिशाली वायरस हमारे लोकतंत्र और समाज के प्रोग्राम में घुस आया है। ऐसा नहीं है कि इसका एंटी-वायरस हमारे प्रोग्राम में नहीं है...... बल्कि है। फिर भी मैं अपने समकालीन बौद्धिकों की मानसिकता पर विचार करता हूँ, तो लगता है कितने क्लीब और नपुंसक समय में जी रहे हैं हम।
जहाँ , जिस देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था इतनी सुचारू रूप से चल रही है.... इतने क्षेत्रीय पार्टियाँ ... क्षेत्रीय नेतागण .... अपने क्षेत्र और समुदाय के मनोविज्ञान को लेकर ऊपर उभर रहे हैं... वैसे माहौल में ऐसा आन्दोलन , जो भ्रष्टाचार जैसे सामान्य और लोकप्रिय मसले को लेकर जनभावनाओं से खिलवाड़ करने को प्रकट होता है... जिसका न तो कोई उद्देश्य है और न कोई दिशा।
राजनैतिक असंतोष से कभी ... किसी ज़माने में एक और आन्दोलन खड़ा हुआ था ... उस आन्दोलन की प्रकृति लोकतान्त्रिक थी और उस आन्दोलन ने सरकार की चूलें हिला दी थी... वह आन्दोलन था... जय प्रकाश नारायण द्वारा आहूत १९७४ का आन्दोलन। याद होगा... ।
हमारा समय मध्यवर्ग के वर्चस्व का समय है... मध्यवर्ग स्वभाव से परजीवी और परावलम्बी होता है... इसे अपनी उन्नति उतनी ख़ुशी नहीं होती जितना दुःख दूसरों की उन्नति से होता है। इसे यह समझ में नहीं आया कि लालू प्रसाद... मुलायम सिंह... मायावती....वगैरह राजनैतिक पटल पर कैसे और क्यों अवतरित हो गए... इन्हें बाल ठाकरे के होने पर ऐतराज नहीं है... नरेन्द्र मोदी के होने पर आश्चर्य नहीं है...
हमारा समय विद्रूप और कुत्सित हो चला है... टीवी वालों को क्या दोष दें ... वे तो क्रिकेट .... फ़िल्मी परेड .... वगैरह किसी भी तमाशे को "प्रायोजक" के मिल जाने पर बेचने को तैयार रहते हैं... इनका तो धंधा है... मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं...
बस थोड़ी सी शिकायत अपने पढ़े-लिखे बौद्धिक साथियों से है... जो लोकतंत्र के राजमार्ग को छोड़कर ... इस सँकरी अनशन की ब्लैकमेल वाली गली के अनुसरण को प्रवृत्त हुए .... बस।

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

साहित्य : एक सहयोगी प्रयास

कोई कुछ कहता नहीं तो इसका मतलब यह नहीं निकलना चाहिए कि कोई कुछ कहना नहीं चाहता। किसी के कुछ
नहीं कहने के बहुत से कारण होते है। यह सोचकर किसी तरह की कोई खुशफहमी नहीं पाल लेना चाहिए कि उसे
मेरा कृत्य पसंद ही है। किसी बड़े कवि ने काव्य व्यवस्था दी है - मौन भी अभिव्यंजना है। लेकिन अभिव्यंजनाओं
का तात्पर्य तो सहृदयों के लिए है, पगुराई भैंसों के लिए नहीं।
हमारे समय की साहित्यिक दुर्दशा यह है कि साहित्य की अभिव्यक्तियाँ अभिधामूलक होती जा रही है। तय है कि
अभिधामूलक होने का कोई प्रयोजन होगा। और वह प्रयोजन है, साहित्य का प्रतिवादी हो जाना। कुछ असाहित्यिक
लोग विमर्श के धुंधलके का बेजा फायदा उठाकर व्यक्तिगत शत्रुता को साहित्यिक जामा देने में लगे हुए है।
प्रभावशाली लोग होते है... साहित्य में प्रवेश पा जाते हैं। अपना बदला गाली गलौच देकर निकाल लेते हैं ..... और
हम किसी अन्य की बेईज्ज़ती और बेबसी पर तालियाँ पीटते हैं। नवागंतुक इसे ही साहित्यिक अभिरुचि का
प्रतिमान मान बैठते हैं। किन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
साहित्य एक सहयोगी प्रयास है। साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह अन्य क्रिया-कलापों के साथ तो सहयोग
बनाए ही , साथ साथ , आपस में भी पारस्परिक संवादिता बनाए रखे।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

मानवीय पीड़ा का प्रेमी

रोते बिलखते शरीफ और सच्चे आदमी की

तारीफ का मज़ा ही कुछ और है

ईमान से.

जिस काव्य में न हो करुणा

जिसे पढ़ कर नहीं फट जाता हो कलेजा

या नहीं तड़पता हो दैन्य और बेबसी से

नायक या नायिका

कहाँ चलता है अपने को.

जब दिखती है समाज और नियति की क्रूरता

जब होता है मर्म पर आघात

जब हृदय का टूट जाता है बंधन

फूट पड़ते हैं निश्छल आंसू

या खौल उठता है रगों में दौड़ता हुआ खून

नियति या समाज की विडंबना पर

तभी आनंद मिलता है सच्चा

साहित्य और कला का

मैं तो खुल कर करता हूँ ऐलान

कि मैं मांसलता के खिलाफ हूँ

मैं तो मानवीय पीड़ा का सच्चा प्रेमी हूँ.