जब भी कोई रेस में हिस्सा लेता है तो उसकी हार्दिक इच्छा जरुर रहती होगी कि वह जीते। लेकिन वह नहीं जीत पाता। इस तरह की प्रतिस्पर्धाओं में सत्ता या पावर निर्णायक की भूमिका निभाया करता है।
यह सत्ता का अनुशासन है कि जब उसे कोई चुनौती देने के विषय में सोचता भी है तो उस खिलाड़ी को प्रतिस्पर्धा के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाता है। भोला-भाला मनुष्य इस गफलत में आ जाता है कि वह योग्य और सामर्थ्यवान है , सो वह प्रतिस्पर्धा में विजयी होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। इसी मानसिकता से संचालित होकर वह पूरी लगन और निष्ठां से प्रतिस्पर्धा की तैयारी में जुट जाता है।
लेकिन सत्ता तो एक ही कमीनी होती है। निर्णय की शक्ति अपनी मुट्ठी में रखती है। उस शक्ति सहारे उभर रहे नए शक्ति-संपन्न खिलाड़ी का मान-मर्दन कर उसकी औकात बता देती है। और हम जैसे लोकतंत्र में यकीन रखने वाले लोग खिसिया कर अपनी झेंप मिटाते है। और अगली प्रतिस्पर्धा में जीत पाने का सपना संजोते हुए फिर से तैयारी में जुट जाता है। वह यह सोच ही नहीं सकता कि निर्णायक शक्ति रखने वाली सत्ता उसके विरुद्ध है और बेईमान है। वह तो बस अपने को हारा हुआ खिलाड़ी ही मान पाता है।
बुधवार, 3 नवंबर 2010
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
करवा चौथ : परंपरा के नाम पर फैशनपरस्ती
करवाचौथ एक सुपरहिट त्यौहार है। महत्त्वपूर्ण कहना समीचीन नहीं लग रहा, सुपरहिट कहना अधिक युक्ति संगत प्रतीत हो रहा है। इसका भी कारण है। और कारण है हिंदी फ़िल्में, जहाँ इस त्यौहार को काफी धूमधाम और तवज्जो के साथ फिल्माया जाता है। अत्यधिक श्रृंगार करके नायिकाएँ ( स्त्रियाँ ) इस व्रत को अपने उस कथित पति के मंगल और दीर्घायु के लिए निभाती दिखती हैं।
लेकिन सनद रहे, भारत को एक धर्मप्रधान देश होने का ख़िताब प्राप्त है। इस सुपर-डुपर हित करवा चौथ को भी उसी धर्मप्रधानता से जोड़ कर कुछ लोग देखते हैं। तो क्या ऐसा देखा जाना उचित है ? मेरे अनुभव में यह एक फ़िल्मी-प्रभाव लिए फैशन प्रधान व्रत है जिसपर धर्म का मुलम्मा भर है।
वैसे यह स्वर भी , विद्रोही तेवर के साथ, सुनाई पड़ता रहता है कि औरत ही मर्द के लिए व्रत-उपवास क्यों रखे ? मर्दों को भी यह उपवास रखना चाहिए। सो कुछ फिल्मकारों ने ऐसा भी करवाने का ढकोसला अपनी फिल्मों में [ उदहारण के लिए, बागवां] दिखाने का सफल प्रयास किया है।
अगर आप कि आँखें खुली रहती हैं या आप भुक्तभोगी है तो आप शर्तिया जानते होंगे कि करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ चंद घंटे निराहार रहने का कितना बड़ा मुआवजा अपने पति से वसूल करती है। कहने की आवश्यकता शायद नहीं है कि कुरीतियाँ अमीरों के घर से ही जूठन के रूप में बाहर फेंकी जाती है।
और बाज़ार ऐसे मौकों पर अपना हाथ सेंकता है।
अख़बारों और टीवी चैनलों पर इस बाज़ार-नियंत्रित व्रत का मनोरंजक विज्ञापन, कार्यक्रम के रूप में आपको खूब दीखते होंगे। इसका जब भी फुटेज दिखाया जाता होगा तो उसमें महंगे वस्त्र-परिधानों-आभूषणों से लदी कुछ एक स्त्री शरीर भी अनिवार्यतः दिखाए जाते होंगे। इन्हें परिवार की खुशहाली से या दांपत्य के बंधनों को दृढ करने से कोई मतलब नहीं होता। इनका उद्देश्य है अर्धशिक्षित स्त्रियों को फैशनपरस्ती के लिए उकसाना।
पौराणिक कथाओं की सावित्री मृत्यु के देवता से अपने लकड़हारे पति सत्यवान के प्राण वापस लौटा लाती है। वह कामदेव को रिझाने नहीं जा रही होती है जो सोलहो-श्रृंगार कर जाती।
खैर, समझाने वाले मुझे समझा सकते हैं कि इसी बहाने परंपरा की रक्षा होती है तो होने दो। तो मैं कहूँगा , लानत है ऐसी धार्मिक कही जाने वाली परंपरा पर जिसमें अच्छा आभूषण नहीं दिला सकने वाला पति तलाक का शिकार होता है। यह परंपरा दांपत्य में मधुरता नहीं, कटुता और लाचारी लाती होगी। यह बाजारू हो चली परम्पराएं नष्ट क्यों नहीं हो जाती है। लेकिन यह मेरा ख्याल है । इस फैशनपरस्त परम्परा की जिम्मेदारी जब बाज़ार ने उठा ली है तो मेरे लाख चिल्लाने से मिट नहीं सकती।
करवाचौथ की मंगल कामनाएँ - सतियों को नहीं, बाज़ार के कारोबारियों को !
लेकिन सनद रहे, भारत को एक धर्मप्रधान देश होने का ख़िताब प्राप्त है। इस सुपर-डुपर हित करवा चौथ को भी उसी धर्मप्रधानता से जोड़ कर कुछ लोग देखते हैं। तो क्या ऐसा देखा जाना उचित है ? मेरे अनुभव में यह एक फ़िल्मी-प्रभाव लिए फैशन प्रधान व्रत है जिसपर धर्म का मुलम्मा भर है।
वैसे यह स्वर भी , विद्रोही तेवर के साथ, सुनाई पड़ता रहता है कि औरत ही मर्द के लिए व्रत-उपवास क्यों रखे ? मर्दों को भी यह उपवास रखना चाहिए। सो कुछ फिल्मकारों ने ऐसा भी करवाने का ढकोसला अपनी फिल्मों में [ उदहारण के लिए, बागवां] दिखाने का सफल प्रयास किया है।
अगर आप कि आँखें खुली रहती हैं या आप भुक्तभोगी है तो आप शर्तिया जानते होंगे कि करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ चंद घंटे निराहार रहने का कितना बड़ा मुआवजा अपने पति से वसूल करती है। कहने की आवश्यकता शायद नहीं है कि कुरीतियाँ अमीरों के घर से ही जूठन के रूप में बाहर फेंकी जाती है।
और बाज़ार ऐसे मौकों पर अपना हाथ सेंकता है।
अख़बारों और टीवी चैनलों पर इस बाज़ार-नियंत्रित व्रत का मनोरंजक विज्ञापन, कार्यक्रम के रूप में आपको खूब दीखते होंगे। इसका जब भी फुटेज दिखाया जाता होगा तो उसमें महंगे वस्त्र-परिधानों-आभूषणों से लदी कुछ एक स्त्री शरीर भी अनिवार्यतः दिखाए जाते होंगे। इन्हें परिवार की खुशहाली से या दांपत्य के बंधनों को दृढ करने से कोई मतलब नहीं होता। इनका उद्देश्य है अर्धशिक्षित स्त्रियों को फैशनपरस्ती के लिए उकसाना।
पौराणिक कथाओं की सावित्री मृत्यु के देवता से अपने लकड़हारे पति सत्यवान के प्राण वापस लौटा लाती है। वह कामदेव को रिझाने नहीं जा रही होती है जो सोलहो-श्रृंगार कर जाती।
खैर, समझाने वाले मुझे समझा सकते हैं कि इसी बहाने परंपरा की रक्षा होती है तो होने दो। तो मैं कहूँगा , लानत है ऐसी धार्मिक कही जाने वाली परंपरा पर जिसमें अच्छा आभूषण नहीं दिला सकने वाला पति तलाक का शिकार होता है। यह परंपरा दांपत्य में मधुरता नहीं, कटुता और लाचारी लाती होगी। यह बाजारू हो चली परम्पराएं नष्ट क्यों नहीं हो जाती है। लेकिन यह मेरा ख्याल है । इस फैशनपरस्त परम्परा की जिम्मेदारी जब बाज़ार ने उठा ली है तो मेरे लाख चिल्लाने से मिट नहीं सकती।
करवाचौथ की मंगल कामनाएँ - सतियों को नहीं, बाज़ार के कारोबारियों को !
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
दुःख: अपना और पराया
दुःख यूँ तो एक लफ्ज है जिसका हम मौके बेमौके इस्तेमाल करते रहते हैं। मसलन, दुःख की बात है कि ..., मुझे इसका दुःख है, दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि ...., दुःख -सुख तो लगा ही रहता है, वगैरह, वगैरह। हमें पता है कि दुःख शब्द का अर्थ है।
मुझे दाँत में दर्द होता है तो मुझे दुःख होता है। कोई मेरे साथ बदतमीजी से पेश आता है तो दुःख होता है। कोई मुझे अनसुना कर देता है तो दुःख होता है। और इन दुखों को मैं दूसरों से शेयर भी करता हूँ/ करना चाहता हूँ यह जताते हुए कि यह दुःख जेनुइन है।
लेकिन जब मैं दूसरों के दुखों पर विचार करता हूँ तो क्या उसी कोटि के दुखों को दुःख मानने को तैयार होता हूँ? शायद नहीं। दूसरे का दुःख मुझे तगड़ा चाहिए। मसलन, बीमारी हो तो कम से कम कैंसर लेबल का हो, चोरी हुई हो तो कंगाली की हालत की हो, किसी मर्द ने अपनी औरत को सताया हो तो या तो बलात्कार हुआ हो या फिर कम से कम जान पे बन आई हो, या इसी तरह के भयानक स्तर का दूसरों दुःख हमें दुखी होने लायक लगता है।
सवाल है कि दुःख क्या है ? कोई नारा है , या कोई संवेदना है, भाव है, विचार है , मुद्दा है , अनुभव है, क्या है ?
मैं दुखी हूँ।
तो क्या फर्क पड़ता है आपको ? उसी तरह आप दुखी हैं तो मुझ पर क्या असर होना चाहिए ?
दार्शनिक विद्वान्, गुणी मुनि, संत महात्मा कहते है कि सुख-दुःख मन के विकल्प है जो पानी के बुलबुले की तरह क्षण-भंगुर है , आते जाते रहते है इसके लिए बहुत अधिक विचलित नहीं होना चाहिए। लेकिन संसार में, व्यवहार में ऐसा नहीं चलता है। अगर आप विचलित नहीं होंगे तो आप संगदिल, कठोर, बेदर्द , जानवर या स्वार्थी कहे जाएँगे और आप ऐसा नहीं चाहते हैं।
बड़ी उलझन होती है। आपको न होती हो लेकिन मुझे होती है, इस दुःख के सवाल पर। उलझन इसलिए क्योंकि मैं अक्सर पसोपेश में पड़ जाता हूँ जब कोई महाशय 'अ' किसी अन्य महाशय 'ब' का दुःख मुझे सुनाते है। ऐसे में मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि मैं किस भाव में प्रतिक्रया करूँ !
कोई बूढ़ा सा निरर्थक हो चुका कोई नेता , अभिनेता , कलाकार, अध्यापक , लेखक, साहित्यकार मर गया , बीमार हो गया तो मुझे कैसी प्रतिक्रिया करनी चाहिए, यही न कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। लेकिन लोग किसी और ही तरह से प्रतिक्रिया करते है , वे दुखी दुखी से दिखना चाहते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पाता, सो मैं खुद की भी नजर में गिरने लगता हूँ।
आज-कल के साहित्य कर्म में भी अनभोगे दुखों को प्रमाणिक अनुभूति की तरह व्यक्त करने का बाज़ार गर्म है। मसलन सवर्णों द्वारा दलितों को सताया जाना और मर्दवादी सोच वाले पुरुषों द्वारा स्त्रियों को रौंदा जाना- साहित्यिक बाज़ार में चलने वाले पक्के मुहरे हैं।
खैर, मैं बात तो कर रहा था दुखों की, मैं दरअसल एक फर्क जानना चाहता था अपने दुःख और पराये दुःख का। दरअसल मैं पहचान भी करना चाह रहा था अपना दुःख और पराया दुःख की, लेकिन शायद मसला इतना उलझता जा रहा है कि..... चलिए फिर कभी।
मुझे दाँत में दर्द होता है तो मुझे दुःख होता है। कोई मेरे साथ बदतमीजी से पेश आता है तो दुःख होता है। कोई मुझे अनसुना कर देता है तो दुःख होता है। और इन दुखों को मैं दूसरों से शेयर भी करता हूँ/ करना चाहता हूँ यह जताते हुए कि यह दुःख जेनुइन है।
लेकिन जब मैं दूसरों के दुखों पर विचार करता हूँ तो क्या उसी कोटि के दुखों को दुःख मानने को तैयार होता हूँ? शायद नहीं। दूसरे का दुःख मुझे तगड़ा चाहिए। मसलन, बीमारी हो तो कम से कम कैंसर लेबल का हो, चोरी हुई हो तो कंगाली की हालत की हो, किसी मर्द ने अपनी औरत को सताया हो तो या तो बलात्कार हुआ हो या फिर कम से कम जान पे बन आई हो, या इसी तरह के भयानक स्तर का दूसरों दुःख हमें दुखी होने लायक लगता है।
सवाल है कि दुःख क्या है ? कोई नारा है , या कोई संवेदना है, भाव है, विचार है , मुद्दा है , अनुभव है, क्या है ?
मैं दुखी हूँ।
तो क्या फर्क पड़ता है आपको ? उसी तरह आप दुखी हैं तो मुझ पर क्या असर होना चाहिए ?
दार्शनिक विद्वान्, गुणी मुनि, संत महात्मा कहते है कि सुख-दुःख मन के विकल्प है जो पानी के बुलबुले की तरह क्षण-भंगुर है , आते जाते रहते है इसके लिए बहुत अधिक विचलित नहीं होना चाहिए। लेकिन संसार में, व्यवहार में ऐसा नहीं चलता है। अगर आप विचलित नहीं होंगे तो आप संगदिल, कठोर, बेदर्द , जानवर या स्वार्थी कहे जाएँगे और आप ऐसा नहीं चाहते हैं।
बड़ी उलझन होती है। आपको न होती हो लेकिन मुझे होती है, इस दुःख के सवाल पर। उलझन इसलिए क्योंकि मैं अक्सर पसोपेश में पड़ जाता हूँ जब कोई महाशय 'अ' किसी अन्य महाशय 'ब' का दुःख मुझे सुनाते है। ऐसे में मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि मैं किस भाव में प्रतिक्रया करूँ !
कोई बूढ़ा सा निरर्थक हो चुका कोई नेता , अभिनेता , कलाकार, अध्यापक , लेखक, साहित्यकार मर गया , बीमार हो गया तो मुझे कैसी प्रतिक्रिया करनी चाहिए, यही न कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। लेकिन लोग किसी और ही तरह से प्रतिक्रिया करते है , वे दुखी दुखी से दिखना चाहते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पाता, सो मैं खुद की भी नजर में गिरने लगता हूँ।
आज-कल के साहित्य कर्म में भी अनभोगे दुखों को प्रमाणिक अनुभूति की तरह व्यक्त करने का बाज़ार गर्म है। मसलन सवर्णों द्वारा दलितों को सताया जाना और मर्दवादी सोच वाले पुरुषों द्वारा स्त्रियों को रौंदा जाना- साहित्यिक बाज़ार में चलने वाले पक्के मुहरे हैं।
खैर, मैं बात तो कर रहा था दुखों की, मैं दरअसल एक फर्क जानना चाहता था अपने दुःख और पराये दुःख का। दरअसल मैं पहचान भी करना चाह रहा था अपना दुःख और पराया दुःख की, लेकिन शायद मसला इतना उलझता जा रहा है कि..... चलिए फिर कभी।
मंगलवार, 7 सितंबर 2010
मैं एक शिक्षक (कविता )
मैं एक शिक्षक
एक मध्यम वर्ग का संकुचित,
कुंठित आदमी।
बाहर की दुनिया में हुई तब्दीली से
बाखबर,
चंद सपने- अपने, बच्चों के, परिवार के
बहुत अधिक अपेक्षाएं दुनिया की, समाज की
सपनों और अपेक्षाओं की प्रत्यंचा से
धनुष की तरह तना मैं
एक शिक्षक
न तो ढंग से किसी बाप का फर्ज निभाया
न बेटे , भाई या पति का
उपहारों में पाए ज्ञान का बोझ
पीठ पर लादे
लद्दू घोड़े की तरह
सच जैसे दिखने वाले झूठ को
सिखाते हुए
मर जाता है जो जमीर
जिनका जमीर बच गया जिन्दा
वे बन जाते दलाल, नेता या प्रोपर्टी-डीलर
लेकिन जो होते हैं शुद्ध शिक्षक
वे मरते मरते
बचा पाता है चंद शब्द,
' बेचारा बड़ा ही भला था '
लेकिन कोई कभी समझ न पाया दर्द
कि मक्कार और ऐयाश माँ-बाप के बच्चों को
इंसानियत का पाठ पढाना कितना मुश्किल होता है
और कितना जिल्लत भरा।
एक मध्यम वर्ग का संकुचित,
कुंठित आदमी।
बाहर की दुनिया में हुई तब्दीली से
बाखबर,
चंद सपने- अपने, बच्चों के, परिवार के
बहुत अधिक अपेक्षाएं दुनिया की, समाज की
सपनों और अपेक्षाओं की प्रत्यंचा से
धनुष की तरह तना मैं
एक शिक्षक
न तो ढंग से किसी बाप का फर्ज निभाया
न बेटे , भाई या पति का
उपहारों में पाए ज्ञान का बोझ
पीठ पर लादे
लद्दू घोड़े की तरह
सच जैसे दिखने वाले झूठ को
सिखाते हुए
मर जाता है जो जमीर
जिनका जमीर बच गया जिन्दा
वे बन जाते दलाल, नेता या प्रोपर्टी-डीलर
लेकिन जो होते हैं शुद्ध शिक्षक
वे मरते मरते
बचा पाता है चंद शब्द,
' बेचारा बड़ा ही भला था '
लेकिन कोई कभी समझ न पाया दर्द
कि मक्कार और ऐयाश माँ-बाप के बच्चों को
इंसानियत का पाठ पढाना कितना मुश्किल होता है
और कितना जिल्लत भरा।
शनिवार, 14 अगस्त 2010
हम जन्म लें स्वतन्त्र ही, स्वतन्त्र ही मरें
शुभकामनाएँ ह्रदय की अतल गहराई से !
स्वतंत्रता यानि आज़ादी।
क्या हम सबको आज़ादी पसंद है ?
हमने कभी विचार करके देखा है कि हम कितने बंधन में हैं ?
जैसे ही हम सुख का सपना देखेंगे- हम बंधन को , परतंत्रता को निमंत्रण दे देंगे।
और हमने किया।
गांधीजी ने स्वावलंबन की शिक्षा दी, हमने आधुनिकता की दुहाई देकर उससे किनारा कर लिया।
मैं बाहर देखने को नहीं , अपने आपको और अपने अन्दर देखने का निवेदन करता हूँ । आपको वहीँ अपनी आज़ादी तडपती हुई और लथपथ सी तडपती हुई दिखाई देगी।
वो बाज़ार है जिसके आप स्वेच्छा से गुलाम हो गए हैं, सुविधा के लालच में ..........
ऐसा थोड़े ही है कि गुलामी सुख नहीं देती है, देती है जरूर लेकिन अपने इशारे नाचती भी।
खैर!
१५ अगस्त , स्वतंत्रता दिवस आप सबको बहुत बहुत मुबारक हो। नमस्ते।
स्वतंत्रता यानि आज़ादी।
क्या हम सबको आज़ादी पसंद है ?
हमने कभी विचार करके देखा है कि हम कितने बंधन में हैं ?
जैसे ही हम सुख का सपना देखेंगे- हम बंधन को , परतंत्रता को निमंत्रण दे देंगे।
और हमने किया।
गांधीजी ने स्वावलंबन की शिक्षा दी, हमने आधुनिकता की दुहाई देकर उससे किनारा कर लिया।
मैं बाहर देखने को नहीं , अपने आपको और अपने अन्दर देखने का निवेदन करता हूँ । आपको वहीँ अपनी आज़ादी तडपती हुई और लथपथ सी तडपती हुई दिखाई देगी।
वो बाज़ार है जिसके आप स्वेच्छा से गुलाम हो गए हैं, सुविधा के लालच में ..........
ऐसा थोड़े ही है कि गुलामी सुख नहीं देती है, देती है जरूर लेकिन अपने इशारे नाचती भी।
खैर!
१५ अगस्त , स्वतंत्रता दिवस आप सबको बहुत बहुत मुबारक हो। नमस्ते।
सोमवार, 9 अगस्त 2010
जाति पर आधारित जनगणना ज़रूरी है क्योंकि.......
जाति पर आधारित जनगणना ज़रूरी और बहुत ज़रूरी है क्योंकि हमारे महान देश में बहुत सारे संवैधानिक व्यवस्था जाति के आधार पर ही तय होती है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण हो सकती है, लेकिन यह एक तथ्य है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
बहुत लोग ऐसे हैं जो इस जातीय अंधकार का फायदा उठाकर अपने दुश्चक्रों को पूरा कर लेते हैं। मसलन, बहुत सारे ऐसे लोग है जो सवर्ण होते हुए अनुसूचित जाति का नकली दस्तावेज बनवा कर वैसी सरकारी नौकरी और सुविधाएँ प्राप्त कर लेता है जिसके लिए वह सर्वथा अयोग्य होता है। आप नजरें उठाकर देखें तो आप खुद भी ऐसे नीच किस्म के लोग दिख जाएँगे। ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि हमारे संविधान ने ऐसी सुविधाओं की व्यवस्था पहले ही कर राखी है।
और कहने की आवश्यकता नहीं है कि कोई भी विवेकशील, प्रगतिशील और न्यायप्रिय व्यक्ति ऐसे दुश्चक्रों का समर्थन करना पसंद नहीं करेगा।
यदि जाति की संवैधानिकता पहली बार तय हो रही होती तो शायद विरोध करने का कोई अर्थ भी होता। लेकिन जब यह एक सुनियोजित व्यवस्था की तरह हमारे देश पर फरहरा लहरा रही है वैसे में इसके विरोध का कोई औचित्य समझ में नहीं आ रहा है, कि कुछ मतवाले लोग की बात का विरोध कर रहे है।
एक व्यक्ति को मैं जानता हूँ, अपने प्रान्त में वह अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है, वह इसी वर्ग का प्रमाणपत्र बनवाने गया , लेकिन जो भी मूर्ख अफसर या क्लर्क बैठा था, उसने उससे कहा कि उसका अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र बनेगा और उसने बनवा भी लिया क्योंकि इसमें अधिक फायदा था। ऐसे जातीय अंधेपन को दूर भागने का एक मात्र जरिया है जाति-आधारित जनगणना।
मित्रो,
जाति पर आधारित कदाचार, समर्थन और घेरे बंदी का विरोध किया जा सकता है तो करें। इस कृत्य हमारा भी सहयोग होगा।
बहुत लोग ऐसे हैं जो इस जातीय अंधकार का फायदा उठाकर अपने दुश्चक्रों को पूरा कर लेते हैं। मसलन, बहुत सारे ऐसे लोग है जो सवर्ण होते हुए अनुसूचित जाति का नकली दस्तावेज बनवा कर वैसी सरकारी नौकरी और सुविधाएँ प्राप्त कर लेता है जिसके लिए वह सर्वथा अयोग्य होता है। आप नजरें उठाकर देखें तो आप खुद भी ऐसे नीच किस्म के लोग दिख जाएँगे। ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि हमारे संविधान ने ऐसी सुविधाओं की व्यवस्था पहले ही कर राखी है।
और कहने की आवश्यकता नहीं है कि कोई भी विवेकशील, प्रगतिशील और न्यायप्रिय व्यक्ति ऐसे दुश्चक्रों का समर्थन करना पसंद नहीं करेगा।
यदि जाति की संवैधानिकता पहली बार तय हो रही होती तो शायद विरोध करने का कोई अर्थ भी होता। लेकिन जब यह एक सुनियोजित व्यवस्था की तरह हमारे देश पर फरहरा लहरा रही है वैसे में इसके विरोध का कोई औचित्य समझ में नहीं आ रहा है, कि कुछ मतवाले लोग की बात का विरोध कर रहे है।
एक व्यक्ति को मैं जानता हूँ, अपने प्रान्त में वह अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है, वह इसी वर्ग का प्रमाणपत्र बनवाने गया , लेकिन जो भी मूर्ख अफसर या क्लर्क बैठा था, उसने उससे कहा कि उसका अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र बनेगा और उसने बनवा भी लिया क्योंकि इसमें अधिक फायदा था। ऐसे जातीय अंधेपन को दूर भागने का एक मात्र जरिया है जाति-आधारित जनगणना।
मित्रो,
जाति पर आधारित कदाचार, समर्थन और घेरे बंदी का विरोध किया जा सकता है तो करें। इस कृत्य हमारा भी सहयोग होगा।
गुरुवार, 22 जुलाई 2010
समर्थ की मौत पर सौदेबाजी
कोई बारहवीं का छात्र, समर्थ, कथित रूप से आत्महत्या कर चुका है। उसके जागरूक पिता और परिजन उसकी 'बाला-मित्र ' के पिता पर यह आरोप लगा रहे हैं कि इन्होने ही इस मासूम से समर्थ को आत्महत्या के लिए उकसाया है। मामला गंभीर भी है, मजेदार भी। गंभीर इसलिए, क्योंकि मसला मौत का है और मजेदार इसलिए कि ऐसा आरोप मैंने पहली बार सुना है।
हालाँकि यह कोई नहीं जानता कि आत्महत्या के लिए दरअसल उकसाया किसने ? उसकी गर्लफ्रेंड के पिता ने या स्वयं इसके पिता ने ? लेकिन कुछ मेल वगैरह को साबुत बना कर समर्थ के व्यवसायी समझ के पिता उस पिता से ब्लैकमेल कर रहा है जो भारतीय समाज में एक लड़की का पिता है। और, गौरतलब है कि हमारा जागरूक मिडिया बड़े ही अद्भुत ढंग से इस नाटक में निर्देशक , निर्माता तथा कैमरा मैन की भूमिका अदा कर रहा है।
मुझे बेहद ख़ुशी है कि हमलोग अब बहुत तरक्की कर चुके हैं। यदि कोई बेटी या बहन से प्यार करता है यानि पटाता है तो हमें बहुत खुश होना चाहिए और उस महान पुरुष को एकांत प्रदान करना चाहिए, खासकर जब वह आपकी बेटी को बहला रहा हो। अगर आपने उस लड़के को यह कहा कि .......... तो वह दुखी होकर आत्महत्या कर सकता है और उस मासूम की हत्या की जिम्मेदारी आपकी होगी। और तमाम न्यूज पेपर वाले और न्यूज चैनल वाले आपका जीना हराम कर सकते हैं। क्योंकि अमेरिका में ऐसा ही होता होगा।
बेचारे बापों की कितनी ही बेटियों ने फरेबी प्रेमियों के छल के मारे आत्मघात करती हैं और गरीब बाप भारतीय समाज का होने के नाते कितना जिल्लत और फजीहत भोगते हुए अधमरा होकर रह जाता है ....... इसका भी दस्तावेज बने।
मेरी समझ है कि समर्थ के बाप ने अपने बेटे को जलील किया, जुबानी जलील किया -इस वजह से उसके बेटे ने आत्महत्या की लेकिन उसका ओछा बाप इसकी जिम्मेदारी उसकी कथित प्रेमिका के बाप पर डाल रहा है।
भारत जैसे देश में बेटी का बाप यूँ ही अधमरा होता है उसे और मत मारो, समर्थ के बापको पकड़ो , असली अपराधी वही है और अपने कुकृत्य को छुपाने के लिए सारा प्रपंच फैला रहा है।
हालाँकि यह कोई नहीं जानता कि आत्महत्या के लिए दरअसल उकसाया किसने ? उसकी गर्लफ्रेंड के पिता ने या स्वयं इसके पिता ने ? लेकिन कुछ मेल वगैरह को साबुत बना कर समर्थ के व्यवसायी समझ के पिता उस पिता से ब्लैकमेल कर रहा है जो भारतीय समाज में एक लड़की का पिता है। और, गौरतलब है कि हमारा जागरूक मिडिया बड़े ही अद्भुत ढंग से इस नाटक में निर्देशक , निर्माता तथा कैमरा मैन की भूमिका अदा कर रहा है।
मुझे बेहद ख़ुशी है कि हमलोग अब बहुत तरक्की कर चुके हैं। यदि कोई बेटी या बहन से प्यार करता है यानि पटाता है तो हमें बहुत खुश होना चाहिए और उस महान पुरुष को एकांत प्रदान करना चाहिए, खासकर जब वह आपकी बेटी को बहला रहा हो। अगर आपने उस लड़के को यह कहा कि .......... तो वह दुखी होकर आत्महत्या कर सकता है और उस मासूम की हत्या की जिम्मेदारी आपकी होगी। और तमाम न्यूज पेपर वाले और न्यूज चैनल वाले आपका जीना हराम कर सकते हैं। क्योंकि अमेरिका में ऐसा ही होता होगा।
बेचारे बापों की कितनी ही बेटियों ने फरेबी प्रेमियों के छल के मारे आत्मघात करती हैं और गरीब बाप भारतीय समाज का होने के नाते कितना जिल्लत और फजीहत भोगते हुए अधमरा होकर रह जाता है ....... इसका भी दस्तावेज बने।
मेरी समझ है कि समर्थ के बाप ने अपने बेटे को जलील किया, जुबानी जलील किया -इस वजह से उसके बेटे ने आत्महत्या की लेकिन उसका ओछा बाप इसकी जिम्मेदारी उसकी कथित प्रेमिका के बाप पर डाल रहा है।
भारत जैसे देश में बेटी का बाप यूँ ही अधमरा होता है उसे और मत मारो, समर्थ के बापको पकड़ो , असली अपराधी वही है और अपने कुकृत्य को छुपाने के लिए सारा प्रपंच फैला रहा है।
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