कालिदास के विश्व-प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम के दूसरे अंक में नायक दुष्यंत अपने मित्र को अपने ह्रदय-सम्राज्ञी शकुन्तला के सौन्दर्य के विषय में कुछ बता रहा है। यह नाटकीय स्थिति है। वास्तविक स्थिति कुछ और है और वह है कि स्वयं कालिदास सौन्दर्य-चिंतन कर रहे हैं। उनके मन में प्रश्न है कि सबसे सुंदर कौन है ? और वह सबसे सुंदर कहे जाने का अधिकारी कैसे है? इन्हीं प्रश्नों से जूझता हुआ यह श्लोक है। इसमें शायद इस उलझन को सुलझाने का प्रयास भी है। श्लोक कुछ इस तरह है :
चित्रे निवेश्य परिकल्पितसत्त्वयोगा ,
रूपोच्चयेन मनसा विधिना कृता नु ।
स्त्री -रत्न- सृष्टिरपरा भाति मे सा
धातुर्विभुत्वं अनुचिन्त्य वपुश्च तस्याः ।। प्रति
इसका भाव कुछ इस तरह है :
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने शकुन्तला की सृष्टि करने से पहले पूरे मनोयोग से रूप का खजाना लेकर पहले तो उसका चित्र बनाया होगा। चित्र में भूल सुधार की गुंजायश होती है। खैर, दुष्यंत के मुख से कालिदास कहते है कि चित्र की सभी असम्पूर्णता को दूर कर फिर उसमे प्राण-प्रतिष्ठा की गई सुंदर सुंदर। स्त्री-रत्न के रूप में वह मुझको अद्वितीय प्रतीत हो रही है। विधाता ने अपनी सारी विभूति का प्रयोग करके उसके सुंदर शरीर की रचना की। नायक दुष्यंत कह रहे हैं कि शकुन्तला चित्र-लिखित की भांति सुंदर है। अर्थात सौन्दर्य का पैमाना चित्र है। चित्र स्वयं विधाता की रचना से भी श्रेष्ठ होता है।कवि कालिदास शकुन्तला को सबसे सुंदर स्त्रीरत्न के रूप में प्रस्तावित कर रहे हैं और शायद उन्हें सबसे सुंदर कह देने से संतोष नहीं हो रहा । स्थिति आसान नहीं है। इसलिए उन्होंने चित्र दृष्टान्त से बात कर रहे हैं।खैर , ये तो कालिदास का ऊहापोह रहा , आइए थोड़ा सा हम विचार करें।मैं आपसबसे एक सवाल करता हूँ।चित्र ( अनुकरण ) बेहतर होता है अथवा चित्र की वस्तु यानि जिसका चित्र बनाया गया ?सवाल बड़ा गंभीर है ।यदि आप लोगों को यह मसला विचार करने लायक लगे तो विमर्श जारी रहेगा (जिसकी उम्मीद बहुत कम है, लोग ब्लॉग पर सस्ती और हलकी बातें पसंद करते हैं , ऐसी पकाऊ और गहरी बातें नहीं, इसलिए ) इसकी सम्भावना कम है। तथापि मेरा निवेदन है कि आप विचार करें और मुझे भी अवगत कराएं।
बुधवार, 1 जुलाई 2009
शनिवार, 6 जून 2009
कविता, ओ कविता
हमारे ब्लॉग का नाम है कविता-समय , लेकिन हमने इस पर एक भी कविता नहीं रखी। लेकिन आज कविता को आपके सामने शर्मो-हया की दीवार तोड़ कर लाऊंगा ( वैसे आप मेरी कवितायें मेरे दुसरे ब्लॉग " अलक्षित" पर तो पढ़ते ही होंगे - आज पहली बार कविता आएगी ' कविता-समय' पर )
कविता , ओ कविता!
मुझे मालूम है कि तू न तो मेरी प्रेमिका है
न पत्नी या रखैल
माँ, बहन या बेटी .........
तू तो कुछ भी नहीं है मेरी
मुझे तो यहाँ तक भी नहीं पता है
कि तुझे मेरे होने का अहसास है भी या नहीं
फिर भी , मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
कि तू क्या सोचती है मेरे बारे में
या कुछ सोचती भी है या नहीं
लेकिन जब कोई मनचला करता है शरारत तेरे साथ
मेरा जी जलता है
जब कोई गढ़ता है सिद्धांत
कि नहीं है जरुरत दुनिया को कविता की
तो जी करता है
बजाऊँ उसके कान के नीचे जोर का तमाचा
ओ कविता !
तेरे बगैर दुनिया में
आदमजात इन्सान रहेंगे
प्यार को अलगा पाएगा इन्सान
पशुवृत्ति सम्भोग से
शब्दों की सर्जनात्मिका शक्ति बची रह पायेगी तेरे बगैर
ओ मेरी कविता रानी!
बिना कविता के सारे आदमजाद हैवान नहीं हो जायेंगे
मैं नहीं करता इंकार
कि बदले हैं मायने इंसानियत के
बाजार ने बना दिया हर चीज को पण्य
तुम्हे भी दल्ले किस्म के हास्य-कवियों ने
बना दिया है सस्ता नचनिया
लोग खोजते हैं कविताओं में गुदगुदी और उत्तेजना
तो भी ओ कविता,
मैं करता भी हूँ
और दिलाता भी हूँ तुम्हे यकीन
कि प्यार और कविता का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता
चाहे सटोरिये, चटोरिये, पचोरिये -
लगा लें कितना भी जोर
मुझे अहसास है
कि जिस भी दिल में साँस लेती होगी इंसानियत
उस दिल में तुम्हारा कमरा होगा ज़रूर ।
कविता, ओ कविता !
एक बार ज़रा मुस्कुरा दो जी खोल कर ।
कविता , ओ कविता!
मुझे मालूम है कि तू न तो मेरी प्रेमिका है
न पत्नी या रखैल
माँ, बहन या बेटी .........
तू तो कुछ भी नहीं है मेरी
मुझे तो यहाँ तक भी नहीं पता है
कि तुझे मेरे होने का अहसास है भी या नहीं
फिर भी , मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
कि तू क्या सोचती है मेरे बारे में
या कुछ सोचती भी है या नहीं
लेकिन जब कोई मनचला करता है शरारत तेरे साथ
मेरा जी जलता है
जब कोई गढ़ता है सिद्धांत
कि नहीं है जरुरत दुनिया को कविता की
तो जी करता है
बजाऊँ उसके कान के नीचे जोर का तमाचा
ओ कविता !
तेरे बगैर दुनिया में
आदमजात इन्सान रहेंगे
प्यार को अलगा पाएगा इन्सान
पशुवृत्ति सम्भोग से
शब्दों की सर्जनात्मिका शक्ति बची रह पायेगी तेरे बगैर
ओ मेरी कविता रानी!
बिना कविता के सारे आदमजाद हैवान नहीं हो जायेंगे
मैं नहीं करता इंकार
कि बदले हैं मायने इंसानियत के
बाजार ने बना दिया हर चीज को पण्य
तुम्हे भी दल्ले किस्म के हास्य-कवियों ने
बना दिया है सस्ता नचनिया
लोग खोजते हैं कविताओं में गुदगुदी और उत्तेजना
तो भी ओ कविता,
मैं करता भी हूँ
और दिलाता भी हूँ तुम्हे यकीन
कि प्यार और कविता का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता
चाहे सटोरिये, चटोरिये, पचोरिये -
लगा लें कितना भी जोर
मुझे अहसास है
कि जिस भी दिल में साँस लेती होगी इंसानियत
उस दिल में तुम्हारा कमरा होगा ज़रूर ।
कविता, ओ कविता !
एक बार ज़रा मुस्कुरा दो जी खोल कर ।
सोमवार, 1 जून 2009
माधोप्रसाद की छोटी सी दुनिया
अब आप लोगों के लिए माधोप्रसाद अपरिचित नही रहे। पढ़े-लिखे अच्छी नौकरी करने वाले और विचार से प्रगतिशील मनुष्य हैं । कुछ बातें , माधोप्रसाद के विषय में , स्पष्ट कर देना चाहता हूँ :
१) माधोप्रसाद सर्व-स्वीकृत मनुष्य हैं, यानि किसी को कोई शक-शुबहा नहीं है उनके आदमजाद होने पर।
२) माधोप्रसाद की एक पत्नी है ।
३) माधोप्रसाद का एक ससुर भी है, जो रिटायर्ड है। माधोप्रसाद के अनुसार , ससुरे के पास बहुत माल है। यह विश्वास माधोप्रसाद के लिए बेचैनी का सबब है।
४) माधोप्रसाद अपनी पत्नी को मुर्ख और खुबसूरत मानता है।
५) माधोप्रसाद का एक बाप भी है जो जीवित है ।
६) माधोप्रसाद के तीन और भाई हैं ।
७) जैसे माधोप्रसाद का बाप सचमुच माधोप्रसाद का बाप ही है, वैसे ही भाई भी इसके भाई ही हैं।
८) माधोप्रसाद अपने को बहुत होशियार समझता है ।
९) माधोप्रसाद अपनी होशियारी या चालाकी या कमीनापन या इस तरह का और कुछ भी .... सब तिकड़म -अपनी पत्नी, अपने ससुर, अपने बाप और अपने भाइयों पर ही आजमाता है ।
कहना न होगा , माधोप्रसाद अपने काम में पूरी तरह सफल है - तो भी माधोप्रसाद दिन-रात, सुबह-शाम, जब-तब अपने इन्हीं लोगों को उल्लू बना कर लूटने के सपने देखता है और योजनाएं बनाता है ।
यही माधोप्रसाद की छोटी सी , प्यारी सी दुनिया है। माधोप्रसाद अपनी उस दुनिया में खूब तरक्की कर रहा है। माधोप्रसाद को आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उसके दोस्त मित्र उससे ईर्ष्या करते है ।
१०) माधोप्रसाद शर्म को कमजोरी मानता है , वह शर्म की दीवार को पार चुका है। बेशर्म होने को सफलता की कुंजी मानता है।
१) माधोप्रसाद सर्व-स्वीकृत मनुष्य हैं, यानि किसी को कोई शक-शुबहा नहीं है उनके आदमजाद होने पर।
२) माधोप्रसाद की एक पत्नी है ।
३) माधोप्रसाद का एक ससुर भी है, जो रिटायर्ड है। माधोप्रसाद के अनुसार , ससुरे के पास बहुत माल है। यह विश्वास माधोप्रसाद के लिए बेचैनी का सबब है।
४) माधोप्रसाद अपनी पत्नी को मुर्ख और खुबसूरत मानता है।
५) माधोप्रसाद का एक बाप भी है जो जीवित है ।
६) माधोप्रसाद के तीन और भाई हैं ।
७) जैसे माधोप्रसाद का बाप सचमुच माधोप्रसाद का बाप ही है, वैसे ही भाई भी इसके भाई ही हैं।
८) माधोप्रसाद अपने को बहुत होशियार समझता है ।
९) माधोप्रसाद अपनी होशियारी या चालाकी या कमीनापन या इस तरह का और कुछ भी .... सब तिकड़म -अपनी पत्नी, अपने ससुर, अपने बाप और अपने भाइयों पर ही आजमाता है ।
कहना न होगा , माधोप्रसाद अपने काम में पूरी तरह सफल है - तो भी माधोप्रसाद दिन-रात, सुबह-शाम, जब-तब अपने इन्हीं लोगों को उल्लू बना कर लूटने के सपने देखता है और योजनाएं बनाता है ।
यही माधोप्रसाद की छोटी सी , प्यारी सी दुनिया है। माधोप्रसाद अपनी उस दुनिया में खूब तरक्की कर रहा है। माधोप्रसाद को आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उसके दोस्त मित्र उससे ईर्ष्या करते है ।
१०) माधोप्रसाद शर्म को कमजोरी मानता है , वह शर्म की दीवार को पार चुका है। बेशर्म होने को सफलता की कुंजी मानता है।
गुरुवार, 21 मई 2009
अकेलापन से बचने के लिए चीखो, और जोर से चीखो
टेंशन सामान्यतः अकेलेपन का दुष्परिणाम है। अकेलापन कई तरह का होता है। सभी अकेलापनों में वह अकेलापन कि आप बहुत सारे अपनों के बीच रहते हैं लेकिन आपको सुनने वाला , आपको समझने वाला कोई नहीं है। इस तरह के भीड़ के अकेलापन से निजात पाने का रास्ता है कि आप सचमुच अकेले हो जाएँ।
हमारे समय का एक अजब ही दस्तूर है। सभी आपको अपनी बात बताना चाहते हैं। आपके पास ही, मानो, सबसे अधिक धैर्य है कि आप उनकी बात सुनेंगे भी और समझेंगे भी। हाय रे जमाना !
और वहां जहाँ सचमुच आप दो ही व्यक्ति यानि मियां-बीबी या पति-पत्नी रह रहे हैं और दो में से कोई एक अपने जीवन-साथी को नहीं सुन रहा या सुनकर भी नहीं समझ रहा। वहां तो स्थिति और अधिक दारुण है। उन दो अंतरंगों में किसी तीसरे ने (वह तीसरा चाहे कोई हो) प्रवेश किया तो अकेलापन और बढ़ता है, बढ़ता ही जाता है।
एक और प्लेटफोर्म है अकेलापन पैदा होने का- वह है आपका कार्यस्थल यानि ऑफिस । प्रतियोगिता ने इंसानों की नाक में दम कर रखा है। और प्रतियोगिता भी कैसी-कैसी ? आपने कभी सोचा न था जैसे, .......... अपने अपने अनुभवों से समझ लें ।
अकेलापन के और भी कई प्लेटफोर्म है ।
इसी तरह इस अकेलापन की कई और वज़हें भी हैं।
इस स्थिति की वज़ह से डिप्रेसन आदि भयानक बीमारी भी अपना घर आप में बना लेती है। फिर हम मनोचिकित्सकों की सेवा लेने पहुँचते हैं। पता ही होगा कि उनकी दुकान इन दिनों खूब फल-फूल रही है।
यहाँ मैं एक मशविरा देना चाहता हूँ , बिना मांगे ही।
१ ) अकेलापन जब अनिवार्य हो जाय तो उसे बेबसी नहीं शौक बना लेना चाहिए।
२ ) अन्दर की दुनिया बाहर की दुनिया से अधिक खुबसूरत होती है, यकीन मानिये ।
३ ) आखिरी रामबाण नुस्खा-
चीखो , जोर जोर से चीखो , आवाज़ में इतनी तासीर और तल्खी भर दो कि तमाम बलाओं से तुम्हारी रक्षा तुम्हारी ख़ुद की आवाज़ करे।
हमारे समय का एक अजब ही दस्तूर है। सभी आपको अपनी बात बताना चाहते हैं। आपके पास ही, मानो, सबसे अधिक धैर्य है कि आप उनकी बात सुनेंगे भी और समझेंगे भी। हाय रे जमाना !
और वहां जहाँ सचमुच आप दो ही व्यक्ति यानि मियां-बीबी या पति-पत्नी रह रहे हैं और दो में से कोई एक अपने जीवन-साथी को नहीं सुन रहा या सुनकर भी नहीं समझ रहा। वहां तो स्थिति और अधिक दारुण है। उन दो अंतरंगों में किसी तीसरे ने (वह तीसरा चाहे कोई हो) प्रवेश किया तो अकेलापन और बढ़ता है, बढ़ता ही जाता है।
एक और प्लेटफोर्म है अकेलापन पैदा होने का- वह है आपका कार्यस्थल यानि ऑफिस । प्रतियोगिता ने इंसानों की नाक में दम कर रखा है। और प्रतियोगिता भी कैसी-कैसी ? आपने कभी सोचा न था जैसे, .......... अपने अपने अनुभवों से समझ लें ।
अकेलापन के और भी कई प्लेटफोर्म है ।
इसी तरह इस अकेलापन की कई और वज़हें भी हैं।
इस स्थिति की वज़ह से डिप्रेसन आदि भयानक बीमारी भी अपना घर आप में बना लेती है। फिर हम मनोचिकित्सकों की सेवा लेने पहुँचते हैं। पता ही होगा कि उनकी दुकान इन दिनों खूब फल-फूल रही है।
यहाँ मैं एक मशविरा देना चाहता हूँ , बिना मांगे ही।
१ ) अकेलापन जब अनिवार्य हो जाय तो उसे बेबसी नहीं शौक बना लेना चाहिए।
२ ) अन्दर की दुनिया बाहर की दुनिया से अधिक खुबसूरत होती है, यकीन मानिये ।
३ ) आखिरी रामबाण नुस्खा-
चीखो , जोर जोर से चीखो , आवाज़ में इतनी तासीर और तल्खी भर दो कि तमाम बलाओं से तुम्हारी रक्षा तुम्हारी ख़ुद की आवाज़ करे।
सोमवार, 18 मई 2009
जाति, धर्म और क्षेत्रवाद से राजनीति की मुक्ति के आसार
पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजों को देख कर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की जनता उन थोथे भारतीय समाजवादियों से मुक्ति चाहती है जो सिर्फ़ जाति और धर्म जैसे भड़काऊ और संवेगात्मक मुद्दों के सहारे चुनाव जीत जाया करते रहे हैं। इस बार के चुनावी नतीजों में सर्वश्री रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, कुमारी मायावती की ( निजी ) पार्टियाँ तथा भारतीय जनता पार्टी की राजनितिक अवनति हुई है ।
ये नेता प्रारम्भ में कथित रूप से पिछडे और दलित जातियों और वर्गों की हिमायत करते हुए राजनीति में दाखिल हुए। उक्त विशेष जातियों और वर्गों की जनता ने इन्हें हाथों हाथ लिया भी। चुनावी विशेषज्ञों की भाषा में जाति और धर्म कुछ इस तरह शामिल हो गया कि भारतीय चुनाव का मतलब सिर्फ़ जातीय समीकरणों का संतुलन- असंतुलन है। स्थिति कुछ भयानक और अंतहीन सी प्रतीत होने लगी थी। मानों भारत में जाति के आलावा कोई और सत्य है ही नहीं।
अपना भला चाहना बुरा नहीं है। विशेष वर्ग की जनता अपने भले की चाह में इन नेताओं को उत्साह के साथ जिताती भी रही। उपर्युक्त सभी नेता उसी जाति-वादी समाजवाद की छत्रछाया में पनपे हैं। जाति के नाम पर मतवाली हुई पड़ी जनता के मतों से जीत-जीतकर ये नेता अपने मतदाताओं को ही बेवकूफ समझने लगे। इन्हें सत्ता के सुख का स्वाद लग गया। ये नेता लोग जनता को अपनी निजी संपत्ति समझने लगे।
चुनावी विश्लेषकों का कहना कि अमुक नेता को अमुक जाति का वोट मिलेगा- इन्हें सच लगने लगा। उन विशेष वर्गों के वोटर इन नेताओं के साथ इसलिए थे कि उन्हें उम्मीद थी कि ये नेता उनके वर्ग को भला चाहते हैं। लेकिन महान जातिवादी मतदाताओं को जब यह भान हुआ कि इन्हे हमारे उत्थान से नहीं , अपने उत्थान से ही मतलब है तब वाही भटकी हुई जनता चौंक कर जग उठी है।
दोस्तों! यह शुरुआत है। सन १९८९ में यह जातिवादी समाजवाद भारतीय राजनीति के आकाश पर दहकते हुए नक्षत्र की तरह उभरा - बीस वर्षों तक चमकता रहा । परिणाम ?
रामविलास पासवान का रिकार्ड वोट से जीतना और फिर हार?
ये नेता प्रारम्भ में कथित रूप से पिछडे और दलित जातियों और वर्गों की हिमायत करते हुए राजनीति में दाखिल हुए। उक्त विशेष जातियों और वर्गों की जनता ने इन्हें हाथों हाथ लिया भी। चुनावी विशेषज्ञों की भाषा में जाति और धर्म कुछ इस तरह शामिल हो गया कि भारतीय चुनाव का मतलब सिर्फ़ जातीय समीकरणों का संतुलन- असंतुलन है। स्थिति कुछ भयानक और अंतहीन सी प्रतीत होने लगी थी। मानों भारत में जाति के आलावा कोई और सत्य है ही नहीं।
अपना भला चाहना बुरा नहीं है। विशेष वर्ग की जनता अपने भले की चाह में इन नेताओं को उत्साह के साथ जिताती भी रही। उपर्युक्त सभी नेता उसी जाति-वादी समाजवाद की छत्रछाया में पनपे हैं। जाति के नाम पर मतवाली हुई पड़ी जनता के मतों से जीत-जीतकर ये नेता अपने मतदाताओं को ही बेवकूफ समझने लगे। इन्हें सत्ता के सुख का स्वाद लग गया। ये नेता लोग जनता को अपनी निजी संपत्ति समझने लगे।
चुनावी विश्लेषकों का कहना कि अमुक नेता को अमुक जाति का वोट मिलेगा- इन्हें सच लगने लगा। उन विशेष वर्गों के वोटर इन नेताओं के साथ इसलिए थे कि उन्हें उम्मीद थी कि ये नेता उनके वर्ग को भला चाहते हैं। लेकिन महान जातिवादी मतदाताओं को जब यह भान हुआ कि इन्हे हमारे उत्थान से नहीं , अपने उत्थान से ही मतलब है तब वाही भटकी हुई जनता चौंक कर जग उठी है।
दोस्तों! यह शुरुआत है। सन १९८९ में यह जातिवादी समाजवाद भारतीय राजनीति के आकाश पर दहकते हुए नक्षत्र की तरह उभरा - बीस वर्षों तक चमकता रहा । परिणाम ?
रामविलास पासवान का रिकार्ड वोट से जीतना और फिर हार?
गुरुवार, 14 मई 2009
माधोप्रसाद के चरित्र के विषय में
माधोप्रसाद कोई अनोखा अजूबा या अनदेखा सा आदमी नहीं है । आपने भी अवश्य देखा होगा उसे। आपको यकीन नहीं आता? चलिए , मैं आपको अभी मिलवाता हूँ।
दोस्तों ! दरअसल मैं आप लोगों की अनुमति और अनुशंसा चाहता हूँ। यदि आप लोगों की आज्ञा होगी तो मैं आप सबको माधोप्रसाद की बहुत सारी कहानियाँ सुनाना चाहूँगा। सिलसिलेवार, धारावाहिक की तरह।
इसका कारण बस इतना है कि माधोप्रसाद है ही इतना प्यारा कि आप भी जानेंगे तो आप भी उससे प्यार कर बैठेंगे । अरे! नज़र घुमा कर देखिये - आपके बगल में ही कोई माधोप्रसाद खड़ा होगा।
चौंकिए मत , मोधोप्रसाद किसी व्यक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का नाम है।
तो फिर आप सब मुझे अनुमत करें तो मैं मधोपसाद की नई कहानी आपके नज़र करूँ!
दोस्तों ! दरअसल मैं आप लोगों की अनुमति और अनुशंसा चाहता हूँ। यदि आप लोगों की आज्ञा होगी तो मैं आप सबको माधोप्रसाद की बहुत सारी कहानियाँ सुनाना चाहूँगा। सिलसिलेवार, धारावाहिक की तरह।
इसका कारण बस इतना है कि माधोप्रसाद है ही इतना प्यारा कि आप भी जानेंगे तो आप भी उससे प्यार कर बैठेंगे । अरे! नज़र घुमा कर देखिये - आपके बगल में ही कोई माधोप्रसाद खड़ा होगा।
चौंकिए मत , मोधोप्रसाद किसी व्यक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का नाम है।
तो फिर आप सब मुझे अनुमत करें तो मैं मधोपसाद की नई कहानी आपके नज़र करूँ!
शनिवार, 9 मई 2009
माधो प्रसाद के ससुर की कार
वैसे तो माधोप्रसाद दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कोलेज के प्रोफेसर हैं । अच्छी खासी तनख्वाह है , प्रेम विवाह किया है सो वाइफ भी कमाऊ है । लेकिन उनके प्रेम विवाह का समाजशास्त्र तनिक अनोखा है।
जब प्रेम करने की प्रक्रिया में थे तो उन्होंने ढंग से पता किया -ससुरों के बारे में तो साफ हुआ कि ससुरे की बस को बेटियाँ ही बेटियाँ हैं लेकिन ससुरे ने ठीक ठाक दौलत इकट्ठी कार रखी है -मन ही मन मुस्कुराकर माधोप्रसाद ने प्रेम को परवान चढाया ।
ससुर पर दबाव बनाने के लिए पत्नी को उल्लू बना कर शादी के बाद भगाया ।
भाग्य का जुदा खेल -
बिना किसी उठा पटक के सब मामला शांत हो गया ।
छः -सात साल पुरानी मारुती-८०० पड़ी हुई थी ससुरजी के पास बिना काम की , सो उन्होंने माधोप्रसाद पर कृपा करते हुए गिफ्ट किया ।
लेकिन माधोप्रसाद ठहरे कम्युनिस्ट सो दोस्तों से बताया कि ससुर से ख़रीदा है। खैर , इस बात के तो कई साल हो चले यानि ४-५ साल ।
ससुर ने पिछले साल खरीदी थी आई टेन।
माधोप्रसाद की नींद साल भर उडी रही, मन बेचैन रहा कुछ जुगत सूझ ही नही रहा था कि किसतरह इस नए कार को हड़पे । वह बेचारी कार भी ससुरे के यहाँ इंटों पे खड़ी रहती, जालिम रिटायर्ड आदमी जाए तो कहाँ जाए ?
माधोप्रसाद को दिन को चैन, न रात को नींद ।
उसने अपनी उस मुर्ख पत्नी को और अधिक मुर्ख बनाने का षड़यंत्र किया। जाकर उसने अपने बाप से कहा कि कार इन्हे दे दो आप तो कहीं आते जाते हो नहीं
पिता ने बेटी की बेवकूफी को समझते हुए कहा कि बेटे, ये कार तो कल ही चोपडा को बेच डाला - अब तो बस एक रास्ता है कि माधोजी पैसे का इनजाम करें तो चोपडा को कार न देकर तुम लोगों को ही दे दूँ । पैसा और कार दोनों घर में ही रह जाएगा ।
अच्छे दिखने की मज़बूरी में माधोप्रसाद को ससुर की कार का वाजिव से अधिक दम देना पड़ा किश्तों में।
शुरू में माधो ने सोचा कि थोड़ा सा पैसा देता हूँ और बाद में देने के नाम पर कार हड़पता हूँ। लेकिन ससुरा तो ससुरा ही निकला, कहा- माधोजी आपमें और मुझमे कोई फर्क तो है नहीं , दिक्कत तो चोपडा है , उसे कैसे समझाऊंगा ।
कमीना माधोप्रसाद खेल तो सब समझता था ,पर बेचारा करे तो क्या करे!
बाज़ार-भाव से ज्यादा पैसा भी देना पड़ा ।
आसपास यही बात फैली कि माधोप्रसाद झूठ बोल रहा है - ससुर कभी पैसा लेगा।
वैसे माधोप्रसाद प्रोफेसर है और कम्युनिस्ट भी है , दहेज़ के सख्त खिलाफ हैं।
जब प्रेम करने की प्रक्रिया में थे तो उन्होंने ढंग से पता किया -ससुरों के बारे में तो साफ हुआ कि ससुरे की बस को बेटियाँ ही बेटियाँ हैं लेकिन ससुरे ने ठीक ठाक दौलत इकट्ठी कार रखी है -मन ही मन मुस्कुराकर माधोप्रसाद ने प्रेम को परवान चढाया ।
ससुर पर दबाव बनाने के लिए पत्नी को उल्लू बना कर शादी के बाद भगाया ।
भाग्य का जुदा खेल -
बिना किसी उठा पटक के सब मामला शांत हो गया ।
छः -सात साल पुरानी मारुती-८०० पड़ी हुई थी ससुरजी के पास बिना काम की , सो उन्होंने माधोप्रसाद पर कृपा करते हुए गिफ्ट किया ।
लेकिन माधोप्रसाद ठहरे कम्युनिस्ट सो दोस्तों से बताया कि ससुर से ख़रीदा है। खैर , इस बात के तो कई साल हो चले यानि ४-५ साल ।
ससुर ने पिछले साल खरीदी थी आई टेन।
माधोप्रसाद की नींद साल भर उडी रही, मन बेचैन रहा कुछ जुगत सूझ ही नही रहा था कि किसतरह इस नए कार को हड़पे । वह बेचारी कार भी ससुरे के यहाँ इंटों पे खड़ी रहती, जालिम रिटायर्ड आदमी जाए तो कहाँ जाए ?
माधोप्रसाद को दिन को चैन, न रात को नींद ।
उसने अपनी उस मुर्ख पत्नी को और अधिक मुर्ख बनाने का षड़यंत्र किया। जाकर उसने अपने बाप से कहा कि कार इन्हे दे दो आप तो कहीं आते जाते हो नहीं
पिता ने बेटी की बेवकूफी को समझते हुए कहा कि बेटे, ये कार तो कल ही चोपडा को बेच डाला - अब तो बस एक रास्ता है कि माधोजी पैसे का इनजाम करें तो चोपडा को कार न देकर तुम लोगों को ही दे दूँ । पैसा और कार दोनों घर में ही रह जाएगा ।
अच्छे दिखने की मज़बूरी में माधोप्रसाद को ससुर की कार का वाजिव से अधिक दम देना पड़ा किश्तों में।
शुरू में माधो ने सोचा कि थोड़ा सा पैसा देता हूँ और बाद में देने के नाम पर कार हड़पता हूँ। लेकिन ससुरा तो ससुरा ही निकला, कहा- माधोजी आपमें और मुझमे कोई फर्क तो है नहीं , दिक्कत तो चोपडा है , उसे कैसे समझाऊंगा ।
कमीना माधोप्रसाद खेल तो सब समझता था ,पर बेचारा करे तो क्या करे!
बाज़ार-भाव से ज्यादा पैसा भी देना पड़ा ।
आसपास यही बात फैली कि माधोप्रसाद झूठ बोल रहा है - ससुर कभी पैसा लेगा।
वैसे माधोप्रसाद प्रोफेसर है और कम्युनिस्ट भी है , दहेज़ के सख्त खिलाफ हैं।
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