जमाना था जब लोग छपी हुई किसी भी बात को प्रमाणिक और निश्चित मानते थे। अख़बार का एक सम्मानित सामाजिक दर्जा था। वह एक दस्तावेज जैसा हुआ करता था। लेकिन उन दिनों बेईमानियाँ कम थीं, धंधेबाजी कम थी। अख़बार जनमत बनाते भी थे और बदलते भी थे। कहा जाता है कि उन दिनों पत्रकारिता मिशन थी। मिशन को प्रभावित करने वाले लोग, प्रायोजित करने वाली शक्तियां तब भी होंगी, लेकिन अख़बार जनता की आँख-कान हुआ करते थे। समाचारों की प्राथमिकता का एक निर्वैयक्तिक मापदंड भी था। लेकिन आज ?
इन दिनों, आरुषि तलवार का मसला फिर अख़बारों में चमका है। अरे साहब, पिछले दो सालों में इस मसले को लेकर बड़ा तमाशा हुआ है। १५ साल की लड़की, जो बड़े प्रोफेशनल डॉक्टर दम्पती की बेटी थी, की किसी ने हत्या कर दी और उसी मकान में एक ५० साल के नौकर की भी हत्या हुई। हमारे देश की सबसे महान जांच एजेंसी सी बी आई उस हत्यारे और हत्या का षड्यन्त्र करने वाले को नहीं खोज पाई। तय है, इसके पीछे भी कुछ कारण होगा। अब इस बात के लिए उस अफसर की नौकरी नहीं ली जा सकती है न ! या सी बी आई को ही बंद किया जा सकता है। नहीं मिला साक्ष्य, बंद कर दो फाइल। लेकिन नहीं, आरुषि को न्याय चाहिए ही चाहिए। इसके लिए शोर हुए हंगामे हुए, तरह तरह के प्रदर्शन हुए। क्यों ?
क्योंकि यह मुद्दा एक अमीर और हाई प्रोफायल परिवार से जुड़ा है। कोई या कई उस परिवार के दोस्त जो सच्चाई जानते होंगे और तलवार दम्पती को मज़ा चखाना चाहते होंगे, वे ही लोग आरुषि के न्याय की गुहार प्रायोजित करते होंगे। अब बेचारा तलवार परिवार! बेटी न्याय का मामला है, समर्थन देना ही पड़ता है। एक बार तो बेचारों ने सी बी आई, उत्तर प्रदेश पुलिस, सरकारी लोग , अदालत वगैरह को मैनेज किया। लेकिन ये पारिवारिक दोस्त को मैनेज्ड कर नहीं पाए, सो उन्होंने मिडिया को उसके पीछे लगा दिया। और साहब, मिडिया के लोग तो कुत्ते की तरह पीछे पड़ जाते हैं।
अब इस बार तलवार दम्पती और परिवार को मिडिया को मैनेज्ड करना होगा। और अख़बारों की भाषा से लगने लगा है कि यह कारवाई शुरू हो चुकी है। समाचार- विश्लेषकों को 'तलवार दम्पती' के चेहरे पर अपराध-बोध का चिह्न नहीं दिखना शुरू हो गया है। धीरे-धीरे अख़बार वाले हत्यारे माँ-बाप को मजबूर और मायूस माँ-बाप में बदल डालेगा। अदालत का क्या है, वहां भी तो मनुष्य ही बैठा है उसे भी ऐयाशी के लिए पैसे की जरुरत होती होगी। बस, एक ही बात बच रही है कि हमारा मध्य-वर्ग प्रधान देश है। ऐसे देशों में एक प्रवृत्ति होती है कि इन तलवारों, पंधेरों, राठौरों को सजा मिलने से मध्य-वर्गीय जनता बड़े ही लुत्फ़ का जायका महसूस करती है। पता नहीं, ये मिडिया वाले यह नपुंसक सुख मिलने देंगे या नहीं।
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
सोमवार, 31 जनवरी 2011
कालबोध और जीवन
१ काल जीवन की पूर्व-स्थिति है।
२ सत्ता कालातीत है, किन्तु उसका अनुभव काल- सापेक्ष है।
३ जीवन शुद्ध सत्ता नहीं है।
४ जीवन में सत्ता अनिवार्यतः एक असत्ता पर आभासित [प्रतीयमान] होती है।
५ इसीलिए जीवन की समाप्ति की बात की जाती है।
६ जीवन ज्ञानात्मक होने से सत्तात्मक प्रतीत होता है किन्तु समाप्त हो जाने से असत्तात्मक सिद्ध होता है।
७ काल वस्तुतः शुद्ध सत्ता का निषेधक है।
८ जो काल [और देश] में संबोध्य है वह अनिवार्यतः नाशवान है।
९ काल [समय] कोई वास्तु नहीं, एक चैतसिक पूर्वग्रह है जो अज्ञानमूलक अभ्यास का चेतन परिणाम है जो व्यक्ति के अहम्बोध पर हावी हो जाता है।
१० अहम्बोध का तात्पर्य है- स्वयं के ज्ञानवान होने का बोध।
११ अहंकार के नाश होने के साथ ही कालबोध[ समय की अनुभूति] भी तिरोहित हो जाता है।
१२ सत्ता से साक्षात्कार अहंकार का तिरोभाव है।
१३ काल और अहंकार से ही जीवन परिचालित होता है।
निष्कर्ष: जीवन को समझने के लिए अपने अहम्बोध और कालबोध को सम्यक रूप से समझें।
२ सत्ता कालातीत है, किन्तु उसका अनुभव काल- सापेक्ष है।
३ जीवन शुद्ध सत्ता नहीं है।
४ जीवन में सत्ता अनिवार्यतः एक असत्ता पर आभासित [प्रतीयमान] होती है।
५ इसीलिए जीवन की समाप्ति की बात की जाती है।
६ जीवन ज्ञानात्मक होने से सत्तात्मक प्रतीत होता है किन्तु समाप्त हो जाने से असत्तात्मक सिद्ध होता है।
७ काल वस्तुतः शुद्ध सत्ता का निषेधक है।
८ जो काल [और देश] में संबोध्य है वह अनिवार्यतः नाशवान है।
९ काल [समय] कोई वास्तु नहीं, एक चैतसिक पूर्वग्रह है जो अज्ञानमूलक अभ्यास का चेतन परिणाम है जो व्यक्ति के अहम्बोध पर हावी हो जाता है।
१० अहम्बोध का तात्पर्य है- स्वयं के ज्ञानवान होने का बोध।
११ अहंकार के नाश होने के साथ ही कालबोध[ समय की अनुभूति] भी तिरोहित हो जाता है।
१२ सत्ता से साक्षात्कार अहंकार का तिरोभाव है।
१३ काल और अहंकार से ही जीवन परिचालित होता है।
निष्कर्ष: जीवन को समझने के लिए अपने अहम्बोध और कालबोध को सम्यक रूप से समझें।
बुधवार, 26 जनवरी 2011
कविता की बात
मैं कविता हूँ।
मेरा जन्म हुआ या आविर्भाव, मुझे नहीं पता
पर इतना पता है कि मैं
अच्छे-बुरे, स्त्री-पुरुष, दलित-ब्राह्मण अथवा अमीर-गरीब
सभी मनुष्यों के हृदय में रहती हूँ, अवश्य रहती हूँ।
कई बार,
मनुष्यों ने मेरा इतिहास लिखने का प्रयास किया है
और हर वे अपनी ही नज़रों में
हास्यास्पद हुए।
मझे इसका मलाल रहता है हमेशा
कि लोग मुझे उपज मानते है मस्तिष्क की
कि जैसे लोग खाना बनाते है,
कपडे या फर्नीचर बनाते है
वैसे ही हमें यानि कविताओं को भी बनाना कहते हैं
वैसे हमारे साथ इस तरह के
प्रयोशालाई व्यवहार तो सभ्यता के उषाकाल से
होता ही रहा है
लेकिन अभी, इन दिनों आदमजादों का मनमाना व्यवहार
कुछ अधिक ही बढ़ गया है
विमर्शों और विचारों के बकवास के लिए
हमें तोप की तरह इस्तेमाल करते हैं
बहुधा हमारी इज्जत गालियों से भी कम होती जा रही
सतही और एकार्थक प्रलापत्मक गद्य को
कह दिया जाता है कविता
यह संकट कुछ वैसा ही है
जैसे वनस्पतियों पर हाई-ब्रिड का प्रकोप छाया है
मैं आपके भी तो हृदय में रहती हूँ
मेरे वजूद के हिफाज़त के लिए
क्या आप कुछ नहीं करेंगे ?
जी हाँ! मैं आपसे ही निवेदन करती हूँ
हमारी नस्ल को संकर होने से बचाइए
मैं कविता हूँ
मुझे दूषित मत कीजिये ...... ।
मेरा जन्म हुआ या आविर्भाव, मुझे नहीं पता
पर इतना पता है कि मैं
अच्छे-बुरे, स्त्री-पुरुष, दलित-ब्राह्मण अथवा अमीर-गरीब
सभी मनुष्यों के हृदय में रहती हूँ, अवश्य रहती हूँ।
कई बार,
मनुष्यों ने मेरा इतिहास लिखने का प्रयास किया है
और हर वे अपनी ही नज़रों में
हास्यास्पद हुए।
मझे इसका मलाल रहता है हमेशा
कि लोग मुझे उपज मानते है मस्तिष्क की
कि जैसे लोग खाना बनाते है,
कपडे या फर्नीचर बनाते है
वैसे ही हमें यानि कविताओं को भी बनाना कहते हैं
वैसे हमारे साथ इस तरह के
प्रयोशालाई व्यवहार तो सभ्यता के उषाकाल से
होता ही रहा है
लेकिन अभी, इन दिनों आदमजादों का मनमाना व्यवहार
कुछ अधिक ही बढ़ गया है
विमर्शों और विचारों के बकवास के लिए
हमें तोप की तरह इस्तेमाल करते हैं
बहुधा हमारी इज्जत गालियों से भी कम होती जा रही
सतही और एकार्थक प्रलापत्मक गद्य को
कह दिया जाता है कविता
यह संकट कुछ वैसा ही है
जैसे वनस्पतियों पर हाई-ब्रिड का प्रकोप छाया है
मैं आपके भी तो हृदय में रहती हूँ
मेरे वजूद के हिफाज़त के लिए
क्या आप कुछ नहीं करेंगे ?
जी हाँ! मैं आपसे ही निवेदन करती हूँ
हमारी नस्ल को संकर होने से बचाइए
मैं कविता हूँ
मुझे दूषित मत कीजिये ...... ।
रविवार, 23 जनवरी 2011
गणतंत्र और भ्रष्टाचार
किसी भी राष्ट्र का गणतंत्र होना प्रशासनीय है क्योंकि वहां के शासक जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों में से हुआ करते हैं। तकनीकी रूप से, जनता अपने शासन-प्रशासन में भागीदार होता है। इस लिए सरकार पर किसी खास पार्टी का एकच्छत्र दबदबा नहीं होता। विभिन्न तबके, समूह और विचार के लोगों का जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाना हमें दीखता है। संतोष का विषय है कि यह जनता का शासन है। जनता के शासन में, प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि, भ्रष्टाचार नहीं होना चाहिए, लेकिन तमाम गणतंत्रों में भ्रष्टाचार की कहानियां सुनने-देखने में आती रही हैं। इसका हमें दुःख और अफ़सोस तो होता है, लेकिन हम उसका रचनात्मक प्रतिकार नहीं करते या कर पाते हैं। ऐसा क्यों होता है? हमें, हम गणतंत्र के लोगों को इस पर विचार करना चाहिए।
कोई भ्रष्ट जन-प्रतिनिधि दुबारा चुना कैसे जा सकता है ? मेरी समझ में यह बड़ा अहम सवाल है। मुझे लगता है कि जो हमारी नज़र में गलत है , भ्रष्ट है या दुराचारी है, उसे हमारा मत या समर्थन किसी भी सूरत में नहीं मिल सकता। किन्तु वास्तविकता इसके एकदम विरुद्ध है, बिलकुल खिलाफ है। जो भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जा चुका है, जिसपर अदालत में मुकद्दमा चल रहा है, मिडिया ने जिसके खिलाफ लगभग सबूत देश के सामने पेश कर दिया, एक ऐसा नेता दुबारा- तिबारा जीतकर आ रहा है, वह भी हमारे, हम गणतंत्र के लोगों के निर्णायक मतों से। यह कैसे संभव हो सकता है ? वह व्यक्ति जो हमारी नजर में अपराधी है, भ्रष्ट है, दुराचारी और पापाचारी है, हमारे ही मतों और समर्थन से कैसे जीत सकता है ? मुझे नहीं समझ में आ रहा है ? मैं इस विरोधाभासी परिदृश्य पर अचंभित हूँ, सदमे में हूँ। फिर भी मैं इस 'वास्तविकता' को समझना चाहता हूँ। इस विरोधाभास की तत्त्व-मीमांसा करना चाहता हूँ। कई दिनों, महीनों, सालों, दशकों से इसी विषय पर सोच रहा हूँ कि कोई भ्रष्टाचारी व्यक्ति हमारा जनप्रतिनिधि दुबारा कैसे बन जाता है? जबकि हम उसे धड़ल्ले से सरेआम जिसकी निंदा कर रहे होते है, जिसे कोस रहे होते है, वह चुनाव में उम्मीदवार बनता है और हमारे मतों से चुनाव जीत कर हमारा प्रतिनिधि बनता है।
इन सभी आश्चर्यजनक परिणामों के पीछे एक मात्र कारण होता है, हमारा मत, जो हम चुनाव में किसी के लिए दान करते हैं तब, जब हम मतदान करते हैं। विरोधाभास की तत्त्व-मीमांसा करते हुए जो सबसे मजबूत तथ्य मेरे सामने आता है वह यही है कि वह हमारे मत से जीतता है। यानि हमें वह भ्रष्ट अथवा गलत नहीं लगता। अथवा उसके भ्रष्टाचार में हमारी भी भागीदारी और हिस्सेदारी होती है। दरअसल हमें ईर्ष्या होती रहती है कि उसने हजारों करोड़ का हाथ मार लिया और हम यहाँ हजारों को तरस रहे हैं। हमें वह गलत नहीं लगता बल्कि वह खुदसे बड़ा खिलाडी लगता है। मनोविज्ञान की भाषा में बात करें तो ईर्ष्या प्रशंसा की ही नकारात्मक अभिव्यक्ति है। एक मच्छर भी आदमी को नुकसान पहुंचाता है तो वह उसे मार देना चाहता है तो भला एक आदमी को कोई कैसे छोड़ सकता है!
मैं इस गणतंत्र-दिवस के उपलक्ष्य पर इस सत्य से रू-ब-रू होकर आत्मालोचन का सन्देश देना चाहता हूँ कि गणतंत्र और भ्रष्टाचार का जो चोली-दामन का सम्बन्ध बनता जा रहा है इसके लिए कौन दोषी है, इस पर निष्पक्ष और निडर होकर परामर्श करें, इस परामर्श में अपने मित्रों को भी शामिल करें।
गणतंत्र-दिवस की ढेरों शुभकामनाओं सहित,
आप ही का एक सुदूरवर्ती मित्र।
कोई भ्रष्ट जन-प्रतिनिधि दुबारा चुना कैसे जा सकता है ? मेरी समझ में यह बड़ा अहम सवाल है। मुझे लगता है कि जो हमारी नज़र में गलत है , भ्रष्ट है या दुराचारी है, उसे हमारा मत या समर्थन किसी भी सूरत में नहीं मिल सकता। किन्तु वास्तविकता इसके एकदम विरुद्ध है, बिलकुल खिलाफ है। जो भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जा चुका है, जिसपर अदालत में मुकद्दमा चल रहा है, मिडिया ने जिसके खिलाफ लगभग सबूत देश के सामने पेश कर दिया, एक ऐसा नेता दुबारा- तिबारा जीतकर आ रहा है, वह भी हमारे, हम गणतंत्र के लोगों के निर्णायक मतों से। यह कैसे संभव हो सकता है ? वह व्यक्ति जो हमारी नजर में अपराधी है, भ्रष्ट है, दुराचारी और पापाचारी है, हमारे ही मतों और समर्थन से कैसे जीत सकता है ? मुझे नहीं समझ में आ रहा है ? मैं इस विरोधाभासी परिदृश्य पर अचंभित हूँ, सदमे में हूँ। फिर भी मैं इस 'वास्तविकता' को समझना चाहता हूँ। इस विरोधाभास की तत्त्व-मीमांसा करना चाहता हूँ। कई दिनों, महीनों, सालों, दशकों से इसी विषय पर सोच रहा हूँ कि कोई भ्रष्टाचारी व्यक्ति हमारा जनप्रतिनिधि दुबारा कैसे बन जाता है? जबकि हम उसे धड़ल्ले से सरेआम जिसकी निंदा कर रहे होते है, जिसे कोस रहे होते है, वह चुनाव में उम्मीदवार बनता है और हमारे मतों से चुनाव जीत कर हमारा प्रतिनिधि बनता है।
इन सभी आश्चर्यजनक परिणामों के पीछे एक मात्र कारण होता है, हमारा मत, जो हम चुनाव में किसी के लिए दान करते हैं तब, जब हम मतदान करते हैं। विरोधाभास की तत्त्व-मीमांसा करते हुए जो सबसे मजबूत तथ्य मेरे सामने आता है वह यही है कि वह हमारे मत से जीतता है। यानि हमें वह भ्रष्ट अथवा गलत नहीं लगता। अथवा उसके भ्रष्टाचार में हमारी भी भागीदारी और हिस्सेदारी होती है। दरअसल हमें ईर्ष्या होती रहती है कि उसने हजारों करोड़ का हाथ मार लिया और हम यहाँ हजारों को तरस रहे हैं। हमें वह गलत नहीं लगता बल्कि वह खुदसे बड़ा खिलाडी लगता है। मनोविज्ञान की भाषा में बात करें तो ईर्ष्या प्रशंसा की ही नकारात्मक अभिव्यक्ति है। एक मच्छर भी आदमी को नुकसान पहुंचाता है तो वह उसे मार देना चाहता है तो भला एक आदमी को कोई कैसे छोड़ सकता है!
मैं इस गणतंत्र-दिवस के उपलक्ष्य पर इस सत्य से रू-ब-रू होकर आत्मालोचन का सन्देश देना चाहता हूँ कि गणतंत्र और भ्रष्टाचार का जो चोली-दामन का सम्बन्ध बनता जा रहा है इसके लिए कौन दोषी है, इस पर निष्पक्ष और निडर होकर परामर्श करें, इस परामर्श में अपने मित्रों को भी शामिल करें।
गणतंत्र-दिवस की ढेरों शुभकामनाओं सहित,
आप ही का एक सुदूरवर्ती मित्र।
बुधवार, 3 नवंबर 2010
जीत और हार
जब भी कोई रेस में हिस्सा लेता है तो उसकी हार्दिक इच्छा जरुर रहती होगी कि वह जीते। लेकिन वह नहीं जीत पाता। इस तरह की प्रतिस्पर्धाओं में सत्ता या पावर निर्णायक की भूमिका निभाया करता है।
यह सत्ता का अनुशासन है कि जब उसे कोई चुनौती देने के विषय में सोचता भी है तो उस खिलाड़ी को प्रतिस्पर्धा के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाता है। भोला-भाला मनुष्य इस गफलत में आ जाता है कि वह योग्य और सामर्थ्यवान है , सो वह प्रतिस्पर्धा में विजयी होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। इसी मानसिकता से संचालित होकर वह पूरी लगन और निष्ठां से प्रतिस्पर्धा की तैयारी में जुट जाता है।
लेकिन सत्ता तो एक ही कमीनी होती है। निर्णय की शक्ति अपनी मुट्ठी में रखती है। उस शक्ति सहारे उभर रहे नए शक्ति-संपन्न खिलाड़ी का मान-मर्दन कर उसकी औकात बता देती है। और हम जैसे लोकतंत्र में यकीन रखने वाले लोग खिसिया कर अपनी झेंप मिटाते है। और अगली प्रतिस्पर्धा में जीत पाने का सपना संजोते हुए फिर से तैयारी में जुट जाता है। वह यह सोच ही नहीं सकता कि निर्णायक शक्ति रखने वाली सत्ता उसके विरुद्ध है और बेईमान है। वह तो बस अपने को हारा हुआ खिलाड़ी ही मान पाता है।
यह सत्ता का अनुशासन है कि जब उसे कोई चुनौती देने के विषय में सोचता भी है तो उस खिलाड़ी को प्रतिस्पर्धा के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाता है। भोला-भाला मनुष्य इस गफलत में आ जाता है कि वह योग्य और सामर्थ्यवान है , सो वह प्रतिस्पर्धा में विजयी होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। इसी मानसिकता से संचालित होकर वह पूरी लगन और निष्ठां से प्रतिस्पर्धा की तैयारी में जुट जाता है।
लेकिन सत्ता तो एक ही कमीनी होती है। निर्णय की शक्ति अपनी मुट्ठी में रखती है। उस शक्ति सहारे उभर रहे नए शक्ति-संपन्न खिलाड़ी का मान-मर्दन कर उसकी औकात बता देती है। और हम जैसे लोकतंत्र में यकीन रखने वाले लोग खिसिया कर अपनी झेंप मिटाते है। और अगली प्रतिस्पर्धा में जीत पाने का सपना संजोते हुए फिर से तैयारी में जुट जाता है। वह यह सोच ही नहीं सकता कि निर्णायक शक्ति रखने वाली सत्ता उसके विरुद्ध है और बेईमान है। वह तो बस अपने को हारा हुआ खिलाड़ी ही मान पाता है।
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
करवा चौथ : परंपरा के नाम पर फैशनपरस्ती
करवाचौथ एक सुपरहिट त्यौहार है। महत्त्वपूर्ण कहना समीचीन नहीं लग रहा, सुपरहिट कहना अधिक युक्ति संगत प्रतीत हो रहा है। इसका भी कारण है। और कारण है हिंदी फ़िल्में, जहाँ इस त्यौहार को काफी धूमधाम और तवज्जो के साथ फिल्माया जाता है। अत्यधिक श्रृंगार करके नायिकाएँ ( स्त्रियाँ ) इस व्रत को अपने उस कथित पति के मंगल और दीर्घायु के लिए निभाती दिखती हैं।
लेकिन सनद रहे, भारत को एक धर्मप्रधान देश होने का ख़िताब प्राप्त है। इस सुपर-डुपर हित करवा चौथ को भी उसी धर्मप्रधानता से जोड़ कर कुछ लोग देखते हैं। तो क्या ऐसा देखा जाना उचित है ? मेरे अनुभव में यह एक फ़िल्मी-प्रभाव लिए फैशन प्रधान व्रत है जिसपर धर्म का मुलम्मा भर है।
वैसे यह स्वर भी , विद्रोही तेवर के साथ, सुनाई पड़ता रहता है कि औरत ही मर्द के लिए व्रत-उपवास क्यों रखे ? मर्दों को भी यह उपवास रखना चाहिए। सो कुछ फिल्मकारों ने ऐसा भी करवाने का ढकोसला अपनी फिल्मों में [ उदहारण के लिए, बागवां] दिखाने का सफल प्रयास किया है।
अगर आप कि आँखें खुली रहती हैं या आप भुक्तभोगी है तो आप शर्तिया जानते होंगे कि करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ चंद घंटे निराहार रहने का कितना बड़ा मुआवजा अपने पति से वसूल करती है। कहने की आवश्यकता शायद नहीं है कि कुरीतियाँ अमीरों के घर से ही जूठन के रूप में बाहर फेंकी जाती है।
और बाज़ार ऐसे मौकों पर अपना हाथ सेंकता है।
अख़बारों और टीवी चैनलों पर इस बाज़ार-नियंत्रित व्रत का मनोरंजक विज्ञापन, कार्यक्रम के रूप में आपको खूब दीखते होंगे। इसका जब भी फुटेज दिखाया जाता होगा तो उसमें महंगे वस्त्र-परिधानों-आभूषणों से लदी कुछ एक स्त्री शरीर भी अनिवार्यतः दिखाए जाते होंगे। इन्हें परिवार की खुशहाली से या दांपत्य के बंधनों को दृढ करने से कोई मतलब नहीं होता। इनका उद्देश्य है अर्धशिक्षित स्त्रियों को फैशनपरस्ती के लिए उकसाना।
पौराणिक कथाओं की सावित्री मृत्यु के देवता से अपने लकड़हारे पति सत्यवान के प्राण वापस लौटा लाती है। वह कामदेव को रिझाने नहीं जा रही होती है जो सोलहो-श्रृंगार कर जाती।
खैर, समझाने वाले मुझे समझा सकते हैं कि इसी बहाने परंपरा की रक्षा होती है तो होने दो। तो मैं कहूँगा , लानत है ऐसी धार्मिक कही जाने वाली परंपरा पर जिसमें अच्छा आभूषण नहीं दिला सकने वाला पति तलाक का शिकार होता है। यह परंपरा दांपत्य में मधुरता नहीं, कटुता और लाचारी लाती होगी। यह बाजारू हो चली परम्पराएं नष्ट क्यों नहीं हो जाती है। लेकिन यह मेरा ख्याल है । इस फैशनपरस्त परम्परा की जिम्मेदारी जब बाज़ार ने उठा ली है तो मेरे लाख चिल्लाने से मिट नहीं सकती।
करवाचौथ की मंगल कामनाएँ - सतियों को नहीं, बाज़ार के कारोबारियों को !
लेकिन सनद रहे, भारत को एक धर्मप्रधान देश होने का ख़िताब प्राप्त है। इस सुपर-डुपर हित करवा चौथ को भी उसी धर्मप्रधानता से जोड़ कर कुछ लोग देखते हैं। तो क्या ऐसा देखा जाना उचित है ? मेरे अनुभव में यह एक फ़िल्मी-प्रभाव लिए फैशन प्रधान व्रत है जिसपर धर्म का मुलम्मा भर है।
वैसे यह स्वर भी , विद्रोही तेवर के साथ, सुनाई पड़ता रहता है कि औरत ही मर्द के लिए व्रत-उपवास क्यों रखे ? मर्दों को भी यह उपवास रखना चाहिए। सो कुछ फिल्मकारों ने ऐसा भी करवाने का ढकोसला अपनी फिल्मों में [ उदहारण के लिए, बागवां] दिखाने का सफल प्रयास किया है।
अगर आप कि आँखें खुली रहती हैं या आप भुक्तभोगी है तो आप शर्तिया जानते होंगे कि करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ चंद घंटे निराहार रहने का कितना बड़ा मुआवजा अपने पति से वसूल करती है। कहने की आवश्यकता शायद नहीं है कि कुरीतियाँ अमीरों के घर से ही जूठन के रूप में बाहर फेंकी जाती है।
और बाज़ार ऐसे मौकों पर अपना हाथ सेंकता है।
अख़बारों और टीवी चैनलों पर इस बाज़ार-नियंत्रित व्रत का मनोरंजक विज्ञापन, कार्यक्रम के रूप में आपको खूब दीखते होंगे। इसका जब भी फुटेज दिखाया जाता होगा तो उसमें महंगे वस्त्र-परिधानों-आभूषणों से लदी कुछ एक स्त्री शरीर भी अनिवार्यतः दिखाए जाते होंगे। इन्हें परिवार की खुशहाली से या दांपत्य के बंधनों को दृढ करने से कोई मतलब नहीं होता। इनका उद्देश्य है अर्धशिक्षित स्त्रियों को फैशनपरस्ती के लिए उकसाना।
पौराणिक कथाओं की सावित्री मृत्यु के देवता से अपने लकड़हारे पति सत्यवान के प्राण वापस लौटा लाती है। वह कामदेव को रिझाने नहीं जा रही होती है जो सोलहो-श्रृंगार कर जाती।
खैर, समझाने वाले मुझे समझा सकते हैं कि इसी बहाने परंपरा की रक्षा होती है तो होने दो। तो मैं कहूँगा , लानत है ऐसी धार्मिक कही जाने वाली परंपरा पर जिसमें अच्छा आभूषण नहीं दिला सकने वाला पति तलाक का शिकार होता है। यह परंपरा दांपत्य में मधुरता नहीं, कटुता और लाचारी लाती होगी। यह बाजारू हो चली परम्पराएं नष्ट क्यों नहीं हो जाती है। लेकिन यह मेरा ख्याल है । इस फैशनपरस्त परम्परा की जिम्मेदारी जब बाज़ार ने उठा ली है तो मेरे लाख चिल्लाने से मिट नहीं सकती।
करवाचौथ की मंगल कामनाएँ - सतियों को नहीं, बाज़ार के कारोबारियों को !
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
दुःख: अपना और पराया
दुःख यूँ तो एक लफ्ज है जिसका हम मौके बेमौके इस्तेमाल करते रहते हैं। मसलन, दुःख की बात है कि ..., मुझे इसका दुःख है, दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि ...., दुःख -सुख तो लगा ही रहता है, वगैरह, वगैरह। हमें पता है कि दुःख शब्द का अर्थ है।
मुझे दाँत में दर्द होता है तो मुझे दुःख होता है। कोई मेरे साथ बदतमीजी से पेश आता है तो दुःख होता है। कोई मुझे अनसुना कर देता है तो दुःख होता है। और इन दुखों को मैं दूसरों से शेयर भी करता हूँ/ करना चाहता हूँ यह जताते हुए कि यह दुःख जेनुइन है।
लेकिन जब मैं दूसरों के दुखों पर विचार करता हूँ तो क्या उसी कोटि के दुखों को दुःख मानने को तैयार होता हूँ? शायद नहीं। दूसरे का दुःख मुझे तगड़ा चाहिए। मसलन, बीमारी हो तो कम से कम कैंसर लेबल का हो, चोरी हुई हो तो कंगाली की हालत की हो, किसी मर्द ने अपनी औरत को सताया हो तो या तो बलात्कार हुआ हो या फिर कम से कम जान पे बन आई हो, या इसी तरह के भयानक स्तर का दूसरों दुःख हमें दुखी होने लायक लगता है।
सवाल है कि दुःख क्या है ? कोई नारा है , या कोई संवेदना है, भाव है, विचार है , मुद्दा है , अनुभव है, क्या है ?
मैं दुखी हूँ।
तो क्या फर्क पड़ता है आपको ? उसी तरह आप दुखी हैं तो मुझ पर क्या असर होना चाहिए ?
दार्शनिक विद्वान्, गुणी मुनि, संत महात्मा कहते है कि सुख-दुःख मन के विकल्प है जो पानी के बुलबुले की तरह क्षण-भंगुर है , आते जाते रहते है इसके लिए बहुत अधिक विचलित नहीं होना चाहिए। लेकिन संसार में, व्यवहार में ऐसा नहीं चलता है। अगर आप विचलित नहीं होंगे तो आप संगदिल, कठोर, बेदर्द , जानवर या स्वार्थी कहे जाएँगे और आप ऐसा नहीं चाहते हैं।
बड़ी उलझन होती है। आपको न होती हो लेकिन मुझे होती है, इस दुःख के सवाल पर। उलझन इसलिए क्योंकि मैं अक्सर पसोपेश में पड़ जाता हूँ जब कोई महाशय 'अ' किसी अन्य महाशय 'ब' का दुःख मुझे सुनाते है। ऐसे में मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि मैं किस भाव में प्रतिक्रया करूँ !
कोई बूढ़ा सा निरर्थक हो चुका कोई नेता , अभिनेता , कलाकार, अध्यापक , लेखक, साहित्यकार मर गया , बीमार हो गया तो मुझे कैसी प्रतिक्रिया करनी चाहिए, यही न कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। लेकिन लोग किसी और ही तरह से प्रतिक्रिया करते है , वे दुखी दुखी से दिखना चाहते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पाता, सो मैं खुद की भी नजर में गिरने लगता हूँ।
आज-कल के साहित्य कर्म में भी अनभोगे दुखों को प्रमाणिक अनुभूति की तरह व्यक्त करने का बाज़ार गर्म है। मसलन सवर्णों द्वारा दलितों को सताया जाना और मर्दवादी सोच वाले पुरुषों द्वारा स्त्रियों को रौंदा जाना- साहित्यिक बाज़ार में चलने वाले पक्के मुहरे हैं।
खैर, मैं बात तो कर रहा था दुखों की, मैं दरअसल एक फर्क जानना चाहता था अपने दुःख और पराये दुःख का। दरअसल मैं पहचान भी करना चाह रहा था अपना दुःख और पराया दुःख की, लेकिन शायद मसला इतना उलझता जा रहा है कि..... चलिए फिर कभी।
मुझे दाँत में दर्द होता है तो मुझे दुःख होता है। कोई मेरे साथ बदतमीजी से पेश आता है तो दुःख होता है। कोई मुझे अनसुना कर देता है तो दुःख होता है। और इन दुखों को मैं दूसरों से शेयर भी करता हूँ/ करना चाहता हूँ यह जताते हुए कि यह दुःख जेनुइन है।
लेकिन जब मैं दूसरों के दुखों पर विचार करता हूँ तो क्या उसी कोटि के दुखों को दुःख मानने को तैयार होता हूँ? शायद नहीं। दूसरे का दुःख मुझे तगड़ा चाहिए। मसलन, बीमारी हो तो कम से कम कैंसर लेबल का हो, चोरी हुई हो तो कंगाली की हालत की हो, किसी मर्द ने अपनी औरत को सताया हो तो या तो बलात्कार हुआ हो या फिर कम से कम जान पे बन आई हो, या इसी तरह के भयानक स्तर का दूसरों दुःख हमें दुखी होने लायक लगता है।
सवाल है कि दुःख क्या है ? कोई नारा है , या कोई संवेदना है, भाव है, विचार है , मुद्दा है , अनुभव है, क्या है ?
मैं दुखी हूँ।
तो क्या फर्क पड़ता है आपको ? उसी तरह आप दुखी हैं तो मुझ पर क्या असर होना चाहिए ?
दार्शनिक विद्वान्, गुणी मुनि, संत महात्मा कहते है कि सुख-दुःख मन के विकल्प है जो पानी के बुलबुले की तरह क्षण-भंगुर है , आते जाते रहते है इसके लिए बहुत अधिक विचलित नहीं होना चाहिए। लेकिन संसार में, व्यवहार में ऐसा नहीं चलता है। अगर आप विचलित नहीं होंगे तो आप संगदिल, कठोर, बेदर्द , जानवर या स्वार्थी कहे जाएँगे और आप ऐसा नहीं चाहते हैं।
बड़ी उलझन होती है। आपको न होती हो लेकिन मुझे होती है, इस दुःख के सवाल पर। उलझन इसलिए क्योंकि मैं अक्सर पसोपेश में पड़ जाता हूँ जब कोई महाशय 'अ' किसी अन्य महाशय 'ब' का दुःख मुझे सुनाते है। ऐसे में मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि मैं किस भाव में प्रतिक्रया करूँ !
कोई बूढ़ा सा निरर्थक हो चुका कोई नेता , अभिनेता , कलाकार, अध्यापक , लेखक, साहित्यकार मर गया , बीमार हो गया तो मुझे कैसी प्रतिक्रिया करनी चाहिए, यही न कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। लेकिन लोग किसी और ही तरह से प्रतिक्रिया करते है , वे दुखी दुखी से दिखना चाहते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पाता, सो मैं खुद की भी नजर में गिरने लगता हूँ।
आज-कल के साहित्य कर्म में भी अनभोगे दुखों को प्रमाणिक अनुभूति की तरह व्यक्त करने का बाज़ार गर्म है। मसलन सवर्णों द्वारा दलितों को सताया जाना और मर्दवादी सोच वाले पुरुषों द्वारा स्त्रियों को रौंदा जाना- साहित्यिक बाज़ार में चलने वाले पक्के मुहरे हैं।
खैर, मैं बात तो कर रहा था दुखों की, मैं दरअसल एक फर्क जानना चाहता था अपने दुःख और पराये दुःख का। दरअसल मैं पहचान भी करना चाह रहा था अपना दुःख और पराया दुःख की, लेकिन शायद मसला इतना उलझता जा रहा है कि..... चलिए फिर कभी।
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